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दान से धन कम नहीं होता.....!! / सैयद सलमान
Friday, November 26, 2021 - 9:42:08 AM - By सैयद सलमान

दान से धन कम नहीं होता.....!! / सैयद सलमान
ज़रूरतमंद को सदक़ा देना दरअसल व्यक्ति को बाहर और भीतर से शुद्ध करता है
साभार- दोपहर का सामना 26 11 2021

मुस्लिम समाज में इस्लामी शिक्षाओं और अवधारणाओं के संबंध में विश्वास और ज्ञान की रोशनी में अपने सोचने और कार्य करने के तरीक़े को जवाबदेह माना गया है। लेकिन यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि कट्टरपंथी मुसलमानों ने जीवन के हर पहलू में न केवल इस्लामी शिक्षाओं और अवधारणाओं को विकृत किया है, बल्कि उन शिक्षाओं की आत्मा को भी दूषित किया है। सही इस्लामी शिक्षा और विचारों को भी पूरी तरह से भुला दिया गया है। नेकी के कार्यों को भी अनदेखा कर दिया गया है। इस्लाम में दान-पुण्य की बड़ी अहमियत है। ऐसा ही एक दान का कार्य है जिसे 'सदक़ा' कहा जाता है। कुरआन और हदीस में दान के महत्व को निरूपित करते हुए उसे सदाचार और प्रेरणा का मार्ग बताया गया है। इस्लामी मान्यतानुसार अपनी-धन-दौलत में से ज़रूरतमंद को सदक़ा देना दरअसल व्यक्ति को बाहर और भीतर से शुद्ध करता है।

अरबी शब्दकोश में सदक़ा के लिए अरबी शब्द 'सदक़' है, यानी सच्चे दिल से, ईमानदारी से, अल्लाह की ख़ातिर अपने भाई-बंधुओं और ज़रूरतमंदों के पक्ष में अपनी पसंदीदा और शुद्ध संपत्ति को छोड़ने की इच्छा व्यक्त करना। सदक़ा का सही अर्थ इस भ्रांति को भी दूर करता है अशुद्ध धन को दान में दिया जा रहा है। बल्कि इसका भाव है कि जो दौलत दान में दी जा रही है वह अल्लाह की राह में दी जा रही है। और जो चीज़ अल्लाह को दी जा रही है वह गंदे, अशुद्ध या बुरे कर्मों का संग्रह कैसे हो सकती है? सदक़ा में दिया जाने वला धन बिलकुल शुद्ध और पसंदीदा होना ज़रूरी है। हलाल रोज़ी की इसीलिए इस्लाम में बड़ी सख़्त ताक़ीद की गई है। पैग़ंबर मोहम्मद साहब की कई हदीसें बार-बार इस बात पर ज़ोर देती हैं कि दान के मामले में, अल्लाह के रास्ते में जितना संभव हो उतना पैसा ख़र्च करना चाहिए। इससे किसी ज़रूरतमंद की मदद भी होती है और नेकियों का सवाब भी मिलता है। इस्लाम ने ईमानदारों की दौलत पर दान का हुक्म शायद इसलिए दिया है, क्योंकि अमीरों से लिया जाने वाला धन ग़रीबों के काम आएगा। इस्लाम कहता है, ‘दान से धन कम नहीं होता।’

इस्लाम ने दान-पुण्य के लिए किसी विशेष चीज़, लिंग या रंग का निर्धारण नहीं किया है, और न ही कोई विशिष्ट दिन या समय निर्धारित किया है। केवल एक बात कही गई है कि एक व्यक्ति ईमानदारी और दिल की गहराइयों के साथ दान करते हुए ज़रूरतमंद के काम आए। क़ुरआन में सदक़े को लेकर कहा गया है कि, ‘‘सदक़ा तो बस ग़रीबों, मुहताजों के लिए है और जो ज़कात प्राप्त करने के काम पर नियुक्त हों उनके लिए है और उन लोगों के लिए है जो ज़रूरतमंद हैं। सदक़ा ग़ुलामों की मुक्ति के लिए, देनदारों की मदद करने के लिए, ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करने के लिए और यात्रियों की मदद करने के लिए है। यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है।’’ (अल-क़ुरआन ९:६०)

अब सवाल यह भी उठता है कि धनवान तो सदक़ा दे देगा तो निर्धन इस पवित्र कार्य को कैसे करे या इसका सवाब कैसे पाए? तो यह जान लेना ज़रूरी है कि इस्लाम में जैसे धनवान को हर सदक़ा पर सवाब मिलता है उसी तरह ग़रीबों को हर नेक नीयत से किए गए हर नेक काम पर सवाब मिलता है। इसलिए जिस ग़रीब के पास धन-दौलत न हो वह नेक आमाल के ज़रिये सदक़े का सवाब हासिल कर सकता है। हदीस में उल्लेख है कि, "किसी छोटे से छोटे नेक काम को भी छोटा और हल्का न समझा जाए और मामूली से मामूली काम में या बात में कंजूसी न की जाए। हर नेकी जो प्रत्यक्ष में छोटी लगती हो, सवाब के एतबार से बड़ी होती है। इस्लाम कहता है, किसी भी व्यक्ति से नर्मी के साथ मिलना भी सदक़ा है। किसी भटके हुए मुसाफिर को रास्ता बता देना सदक़ा है। रास्ते से पत्थर, कांटा या कोई भी तकलीफ़देह चीज़ का हटा देना सदक़ा है। यानी सिर्फ़ माल देना ही सदक़ा नहीं है जो मालदारों का काम है, बल्कि ग़रीब से ग़रीब भी बहुत से नेक कामों में या नेक बात कहने में सदक़ा का सवाब पा सकता है। इसलिए ग़रीब मायूस न हों कि वह सदक़ा-ख़ैरात नहीं कर सकते। दरअसल सदक़ा करना उदारता की निशानी है।

कुछ बहुत छोटी मगर बहुत महत्वपूर्ण ऐसी बातें हैं जिन्हें सदक़ा समझकर करने की बहुत ज़रूरत है। क़ुरआन कहता है, ‘‘तुम हरगिज़ भलाई को ना पहुँचोगे जब तक राहे ख़ुदा में अपनी प्यारी चीज़ ख़र्च न करो और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है।’’ (अल-क़ुरआन ३:९२) यह दृष्टिकोण मानवीय सभ्यता में हज़ारों सालों से मौजूद है कि दूसरों की मदद करना एक सार्थक जीवन का भाग है। इस्लाम ने उसे दीन से जोड़ दिया। क़ुरआन का बारीकी से अध्ययन करने पर ईमान की दलील के तौर पर दान की अहमियत नमाज़ के बराबर मालूम होती है, क्योंकि क़ुरआन में दोनों का एक साथ ज़िक्र कई बार हुआ है। इस्लामी दृष्टिकोण से, दान केवल धन या संपत्ति तक ही सीमित नहीं है बल्कि सम्मान और दया भी सदक़ा है। यह तो तय है कि ये मोहब्बत और स्नेह है जो इंसानों को साझा मानवता से जोड़े रखती है।

मोहम्मद साहब का क़ौल है, ‘‘एक सच्चे मुसलमान की ये पहचान है कि उसकी ज़बान, हाथ और उसके व्यवहार से लोग सलामत रहें।’’ इसका मतलब है, वो किसी शख़्स को तक़लीफ न दे। एक सच्चे मुसलमान को चाहिए कि वो जो कुछ अपने लिए पसंद करता है, वही दूसरों के लिए भी पसंद करे। कोई भी शख़्स यह पसंद नहीं करेगा कि वह तकलीफ़ और मुसीबतों में रहे और दुख उठाए। ऐसे में हर मुसलमान का ये फ़र्ज़ बनता है कि वह अपनी नेकियों से इस्लाम को लेकर फैलती ग़लतफ़हमियों को दूर करे। नेकियां करता जाए और उसमें किसी भी तरह से जाति-धर्म, नस्ल या रंग का कोई भेद न करे। क़ुरआन, हदीस और मोहम्मद साहब की तो यही सीख है। हां, अगल कठमुल्लेपन को अपना आदर्श बनाकर इस्लाम की व्याख्या करने वालों की शिक्षा को अपनाया हो तो वह इस्लाम की दृष्टि में कहीं से भी दुरुस्त नहीं है।

कुछ सदक़े ऐसे हैं जिन्हें एक बार कर दिया जाए तो वह हमेशा जारी रहते हैं ख़्वाह कि सदक़ा देने वाले की मृत्यु भी हो जाए तो सदक़ा जारी रहता है। यह सदक़ा ‘सदक़ा-ए-जारिया’ कहा जाता है। जैसे पानी का पंप लगवा देना, कुआं खुदवाना, दरख़्त लगाना, अस्पताल का निर्माण कराना अथवा अस्पताल में सामान्य वार्ड की स्थापना करना, ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को चिकित्सा उपचार की सुविधा प्रदान करवाना जहां मुफ़्त या कम से कम पैसे से इलाज किया जाए, शैक्षणिक संस्थान का निर्माण करना, इबादतगाह बनाना, स्कूलों और मदरसों में पुस्तकें उपलब्ध कराना, ग़रीब, फ़क़ीर, मिस्कीन और मोहताजों के लिए धर्मशाला और यतीमों के लिए यतीमखाना बनवाना, मदरसों, ज़रूरतमंदों को आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराना या किसी नेक काम के लिए ज़मीन वक़्फ़ कर देना वग़ैरह सदक़ा-ए-जारिया के अंतर्गत आते हैं। इस से आने वाली पीढ़ियां लाभान्वित होती रहती हैं इसलिए भी इसे सदक़ा-ए-जारिया कहा जाता है। सर्वोत्तम दान के लिए व्यक्ति को उस कार्य का चयन करना चाहिए जिसकी अधिक आवश्यकता हो और लाभ लंबे समय तक बना रहे। यह सब कुछ स्थान, काल, पात्र और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। एक सच्चे मुसलमान को चाहिए कि वह अपने सदक़े की रक़म इंसानों के साथ-साथ बेज़ुबान जानवरों और पक्षियों पर भी ख़र्च करे क्योंकि यह भी सवाब का काम है। सदक़े की भावना मात्र से किसी भी नेक इंसान की आत्मा और हृदय में दान-पुण्य के भाव और गुण पैदा हो जाएंगे। और हां, ‘अच्छी बात का प्रसार करना भी एक प्रकार का सदक़ा है।’



(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)