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दशहरा मुबारक: प्रेरक है श्रीराम का चरित्र / सैयद सलमान
Friday, October 15, 2021 - 9:46:31 AM - By सैयद सलमान

दशहरा मुबारक: प्रेरक है श्रीराम का चरित्र / सैयद सलमान
इस्लाम यही कहता है कि अच्छी बात जहां से भी सीखने को मिले सीखना चाहिए।
साभार- दोपहर का सामना 15 10 2021

आज दशहरा है और जुमा भी। यह एक सुखद संयोग है। अब तो कोरोना काल में बंद किये गए धार्मिक स्थल भी खोल दिए गए हैं। ऐसे में दशहरा और जुमा के संगम से आज पूरा देश पूरी तरह आध्यात्मिक रंग में रंगा नज़र आए तो आश्चर्य कैसा। दशहरा को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। जबकि जुमा के दिन मुसलमान एक साथ जमा होकर ईश्वर के प्रति अपनी आस्था जताते हुए अपना सिर झुकाते हैं। हिंदू भाइयों के लिए दशहरा का दिन किसी भी नए काम की शुरुआत के लिए उत्तम होता है। मुस्लिम समाज की भी कोशिश होती है कि वह किसी शुभ कार्य की शुरुआत जुमा से करे। यहां तक कि त्योहारों से इतर अगर नए कपड़े भी पहनने हों तो जुमा को महत्व दिया जाता है। दशहरा पर रामायण पाठ, श्री राम रक्षा स्त्रोत, सुंदरकांड आदि का पाठ किया जाना शुभ माना जाता है। इसी तरह जुमा को मुस्लिम समाज विभिन्न मस्जिदों में धार्मिक गुरुओं द्वारा दिए जाने वाले प्रवचन अर्थात ख़ुत्बा सुनने और जुमा की नमाज़ पढ़ने के लिए पहुंचता है। इसीलिए इस बार का दशहरा दोनों समुदायों के लिए सांकेतिक रूप से एकता का संदेश देता हुआ प्रतीत होता है।

दशहरा का सीधा संबंध अयोध्या और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से है। अयोध्या में सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा मंदिर-मस्जिद विवाद अब ख़त्म हो गया है। कोर्ट के निर्णय के बाद अब वहां भव्य राम मंदिर निर्माण का काम शुरू है। देश के सभी क्षेत्र के लोग श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को दान देने के लिए आगे आए हैं। यहां तक कि, जिस अयोध्या के बहाने सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने का ख़तरा माना जाता था, उसी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए मुस्लिम भी चंदा जुटा रहे हैं। एक उदाहरण है मुस्लिम महिला ज़हरा बेगम का, जो एक सेवाभावी ट्रस्ट चलाती हैं। वह अपने ट्रस्ट के जरिए मुस्लिम समुदाय के लोगों को चंदा देने के लिए प्रेरित कर रही हैं। त्योहारों के बहाने ज़हरा चाहती हैं कि मुस्लिम समुदाय सहित सभी समुदाय के लोग विनायक चतुर्थी, दशहरा और राम नवमी की पूजा के लिए हिंदू भाई-बहनों का सहयोग करेंगे। ज़हरा की सोच यह है कि मुस्लिम समुदाय के लोग स्वैच्छिक रूप से निधि समर्पण अभियान में बढ़चढ़कर हिस्सा लें और मंदिर निर्माण में चंदा देकर सहयोग करें। ज़हरा की यह कोशिश यही साबित कि हमारे देश की सच्ची भावना, संस्कृति, परंपरा और विविधता में एकता गहरे तक समाई हुई है।

दशहरा से रामलीलाएं जुड़ी हुई हैं। देश के कई हिस्सों में हिंदू-मुस्लिम मिलकर रामलीला का आयोजन करते हैं। यहां तक कि कई मुस्लिम युवकों को रामलीला के संवाद पूरी तरह याद होते हैं और ज़रूरत पड़ने पर वे किसी भी पात्र का अभिनय भी कर सकते हैं। जिस तरह से अनेक ठिकानों पर मुस्लिम समुदाय के लोग रामलीला में सहयोग करते हैं, ठीक उसी तरह अनेक ठिकानों पर देश की बड़ी संख्या के हिंदू भाई भी मुस्लिम समाज के ईद-ए-मिलाद और मुहर्रम जैसे मौक़ों पर उनके साथ रहते हैं और हर संभव सहयोग करते हैं। यही नहीं कुछ जगहों पर होने वाले हर तरह के धार्मिक आयोजनों में दोनों समुदायों की लगभग बराबरी की भागीदारी रहती है। इन आयोजनों के लिए जिस धनराशि की आवश्यकता होती है, उसमें सभी अपनी क्षमता के अनुसार बढ़-चढ़ कर सहयोग करते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि दशहरा के साथ कई मुस्लिम त्योहार आ जाते हैं। ऐसे समय में दोनों समुदाय के लोग दोनों त्योहारों को एक साथ मनाते हुए एक-दूसरे के त्योहार में शामिल होते हैं।

दरअसल दशहरा में आयोजित की जाने वाली रामलीला हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी क़ायम करती है। अक्सर यही देखा गया है कि रामलीला आपसी सौहार्द और भाईचारे के साथ आयोजित की जाती है। मुस्लिम समाज से जुड़े लोग बाक़ायदा बड़ी संख्या में रामलीला देखने सपरिवार जाते हैं। ऐसे लोग मानते हैं कि रामलीला और रामायण से सभी को सीख लेनी चाहिए क्योंकि श्रीराम का चरित्र प्रेरक है। यह हमें आदर्श और चरित्र निर्माण का पाठ पढ़ाता है। मुस्लिम समाज भी मानता है कि रामलीला से आने वाली पीढ़ी को सीख मिलती है कि मां-बाप क़द्र करें और उनके वचनों का पालन करें। रामलीला देखे जाने के बाद भरत मिलाप का बेहतरीन दृश्य भी लोग अपने जीवन में उतारना चाहते हैं जहां भाइयों के आपसी प्रेम की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है। रामलीला देखकर दूसरे समुदाय की अच्छी बातों का अनुसरण किया जा सकता है। इस्लाम भी तो यही कहता है कि अच्छी बात जहां से भी सीखने को मिले सीखना चाहिए।

दशहरा के बहाने हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें आमजनों तक पहुंचनी चाहिए। ऐसी एकता की बानगी देखनी हो तो हरियाणा के मेवात का उदाहरण दिया जा सकता है, जहां ज़बरदस्त हिंदू-मुस्लिम भाईचारा देखने को मिलता है। यहां दशहरा के पर्व पर रावण का जो पुतला बनाया जाता है, उसे मुस्लिम कलाकार तैयार करते हैं। जब झांकियां और पुतला जलाया जाता है तब बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग देखने के लिए उमड़ते हैं। दशहरा को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। माता दुर्गा की अलग-अलग रूपों की नौ दिन पूजा करने के बाद दसवें दिन कालजयी चरित्र और बुराई का प्रतीक माने जाने वाले रावण, विभीषण और कुंभकर्ण के विशालकाय पुतले को जलाकर बुराई का नाश किया जाता है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर में यह पुतले मुस्लिम समुदाय के कारीगर हिंदू भाइयों के लिए तैयार कर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल वर्षों से पेश करते चले आ रहे हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के हिंदू बहुल गांव चिकलाना में रावण की नाक काटने की अनूठी परंपरा न जाने कितने सालों से चली आ रही है। यहां रावण की मूर्ति की नाक पर वार कर इसे सांकेतिक रूप से काट दिया जाता है। यह अनूठी परंपरा सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल भी है, क्योंकि इसे निभाने में मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़-चढ़कर मदद करते हैं। यहां के हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच रावण की नाक काटे जाने की परंपरा में यह अहम संदेश छिपा है कि, बुराई के प्रतीक की सार्वजनिक रूप से निंदा करते हुए उसके अहंकार को नष्ट करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।

कभी ग्रामीण इलाक़ों का दौरा किया जाए तो मिलेगा कि अधिकांश गांवों में मस्जिदों, ईदगाह और क़ब्रिस्तान के निर्माण के लिए हिंदुओं ने दान स्वरूप मुस्लिम समुदाय को ज़मीनें दी हैं। कई गावों में यही काम मुसलमानों ने हिंदू भाइयों के साथ किया है। कई जगह तो ग़ैर-मुस्लिम भाइयों ने अपनी मर्ज़ी से खेती योग्य अपनी ज़मीन मुस्लिम समाज को दान की है। ज़मीन देने के अलावा हिंदुओं ने मस्जिद, ईदगाह और क़ब्रिस्तान के निर्माण में सहयोग भी किया है। आज के युग में जब सांप्रदायिकता की विषबेल समाज को अंधा बना रही हो, तब ऐसे माहौल में सद्भावना और सुकून भरा संदेश देने की कोशिश की जानी चाहिए। इस देश के लोग भाग्यशाली हैं कि वह उस देश में पैदा हुए जहां श्रीराम ने जन्म लिया। श्री राम ने मानव जाति को सकारात्मक जीवन जीने का तरीक़ा सिखाया। वह पूरी दुनिया के लिए एक नज़ीर हैं। अल्लामा इक़बाल ने उन्हें यूं ही 'इमाम-ए-हिंद' नहीं कहा है। श्रीराम की नेकियां और शिक्षा स्वीकार करना किसी भी धार्मिक नज़रिए से ग़लत नहीं है। श्रीराम, मोहम्मद साहब, ईसा मसीह, गौतम बुद्ध, गुरु नानक किसी धर्म की जागीर नहीं हैं। बल्कि, यह सभी इंसानियत के 'धर्म' का महत्व स्थापित करते हुए समस्त मानव जाति के कल्याण का सही मार्ग बताने वाली श्रद्धेय विभूतियां हैं।



(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)