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नफ़रत के दौर में अमन की बात / सैयद सलमान
Friday, December 2, 2022 - 9:39:11 AM - By सैयद सलमान

नफ़रत के दौर में अमन की बात / सैयद सलमान
गीता हो या क़ुरआन, इंसान किसी के बताए रास्ते पर चले, वह रास्ता नेकी की ओर ही जाता है
साभार- दोपहर का सामना 02 12 2022

“इंसानियत हमारा पहला धर्म होना चाहिए। अगर आप अच्छे इंसान नहीं हैं तो अच्छे मुस्लिम या हिंदू नहीं हो सकते। ईश्वर केवल एक है और उसकी नज़र हम सब पर बराबर है। किसी किताब का आकलन उसके कवर से न करें।” यह विचार हैं पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हिबा फ़ातिमा नाम की एक मुस्लिम नवयुवती के, जो तेलंगाना की रहने वाली है। कहा जा सकता है कि हिबा ने ऐसी कौन सी नई बात कह दी? इससे पहले कई दार्शनिक, विभिन्न धर्मों के धर्मगुरु, शिक्षित बुद्धिजीवी और अनेक समाजसेवी यही बात तो कहते रहे हैं। लेकिन यह लड़की थोड़ी अलग इसलिए है, क्योंकि यह बात सिर्फ़ वह कह नहीं रही, बल्कि अपने कहे को साबित करने के लिए वह ऐसा कार्य कर रही है जिससे दो धर्मों के बीच की खाई को पाटा जा सके। चेहरे पर नक़ाब और सिर पर हिजाब धारण करने वाली धर्मभीरू हिबा ने तीन महीने में श्रीमद्भगवद्गीता के सभी १८ अध्यायों के ७०० श्लोकों का उर्दू में अनुवाद कर आपसी इत्तेहाद की एक अनूठी मिसाल क़ायम कर दी है। हिबा के इस क़दम से मज़हब के नाम पर सियासत करने वालों को करारा जवाब दिया जा सकता है। हिबा ने क़ुरआन शरीफ़ और गीता का न केवल गहन अध्ययन किया, बल्कि अध्ययन करने के दौरान उसने पाया कि दोनों पवित्र ग्रंथों के क़रीब ५०० श्लोक और आयतें एक जैसी शिक्षा देते हैं। हिबा ने दोनों धर्मग्रंथों की उन्हीं समानता का निचोड़ निकालकर धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए ‘भगवद्गीता और क़ुरआन के बीच समानता’ शीर्षक से एक पूरी किताब लिख दी है। गीता के अनुवाद में हिबा ने शब्दों के सटीक अर्थ खोजने में भी अच्छी-खासी मशक़्क़त की है, ताकि सरल से सरल भाषा में पुस्तक आम लोगों तक पहुंच सके। यही नहीं, हिबा गीता ज्ञान संबंधी वीडियो भी अपलोड करती रहती है। आज के दौर के उलजुलूल और असंवेदनशील पोस्ट करने वाले अधिकांश भटके हुए नौजवानों से अलग हिबा सोशल मीडिया माध्यमों को आध्यात्मिक शिक्षा का प्रसार करने के लिए इस्तेमाल करती है।

दरअसल होना भी यही चाहिए। गीता और क़ुरआन में सामंजस्य के लिए इन ग्रंथों का अध्ययन और सत्संग से ज्ञान का आदान-प्रदान बेहद ज़रूरी है। अतीत में कई लोगों ने इस पर काम किया है। लेकिन युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रभाव में ज़्यादा है। जिस सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को क़रीब लाने में मदद की, उसी सोशल मीडिया को नफ़रत परोसने का आसान संसाधन बना दिया गया है। इस काम में युवाओं को इतनी महीन साज़िश करते हुए लगाया गया कि, वह समझ ही न पा रहे कि उनका इस्तेमाल हो रहा है। धड़ाधड़ ऐसी बातें अपलोड हुईं कि ज़रा सा कुछ शोध की मंशा से सर्च इंजन पर जाया जाए, तो झूठ और मनगढ़ंत सामग्री प्रचुर मात्रा में मिल जाएगी। और उस पर तुर्रा यह कि ज्ञानवर्धक किताबों से दूर होती युवा पीढ़ी उसी सामग्री को सत्य मानकर आत्मसात कर लेती है। फिर अपनी तार्किक बुद्धि का भी इस्तेमाल करने की उनकी कोई इच्छा नहीं रह जाती। यही असत्य उनके लिए आख़िरी सत्य बन जाता है और समाज में जहर फैलता जाता है। उसके दुष्परिणामों से हर कोई परिचित है। लेकिन या तो वह लाचार है या फिर कुछ बोलने या करने की इच्छा और हिम्मत ही नहीं है। ऐसे में धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने की शौक़ीन हिबा फ़ातिमा जैसी बच्ची उम्मीद की किरण बनकर सामने आती है, जिसके प्रयास नफ़रत के दौर में अम्न-ओ-अमान की अलख जगाते हैं साथ ही सकारात्मक ऊर्जा का अहसास भी कराते हैं।

क़ुरआन और गीता के बीच लगभग ३५०० वर्षों का अंतर है। फिर भी ऐसी कई बातें हैं जो श्रीकृष्ण ने गीता में कही हैं, वही बातें क़ुरआन में भी पाई जाती हैं। गीता में एक जगह श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘हे पार्थ हर कार्य को तू परमेश्वर को समर्पित करके कर, तो वह कार्य देवतुल्य ही होगा।’ इस संवाद को अगर इस्लाम के नज़रिए से देखा जाए तो ज्ञात होगा कि ‘इस्लाम’ के अनुयायी ‘मुस्लिम’ शब्द का अर्थ ही समर्पण होता है। क़ुरआन परमेश्वर के आगे समर्पण से जीने का एलान करता है जिसे इस्लाम कहा गया है। फ़र्क़ सिर्फ़ स्थान, काल और पात्र का है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को द्वापर युग में भगवद्गीता का उपदेश दिया था। जबकि पैग़म्बर मोहम्मद साहब पर क़ुरआनी आयत उतरने का सिलसिला वर्ष ६१० ईस्वी वर्ष यानी लगभग १४१२ वर्ष पहले शुरू हुआ। एक की भाषा संस्कृत है तो दूसरे की अरबी है। गीता महाभारत के युद्ध के दौरान बोली गई थी, जबकि मोहम्मद साहब पर क़ुरआन का ख़ुलासा हज़रत जिब्रील के माध्यम से हुआ था।

दोनों पवित्र ग्रंथों में कर्म को महान बताया गया है। जैसा कर्म करोगे वैसा फल भुगतना पड़ेगा। कर्म के आधार पर ही स्वर्ग-नर्क की प्राप्ति होगी। एक प्रमाणिक समानता की यहां चर्चा हो सकती है जिस पर हर हिंदू-मुसलमान की ज़बरदस्त आस्था है, वह है आत्मा यानि रूह।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः
(भगवदगीता - २:२३)
भावार्थ : इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकती। अर्थात, आत्मा यानि रूह ईश्वर के क़ब्ज़े में है। दुनिया की कोई भी वस्तु आत्मा का कुछ भी नही बिगाड़ सकती वो सिर्फ़ ईश्वर की आज्ञा में है। वह चाहे जैसा आत्मा यानि रूह का उपयोग करे।

यही बात क़ुरआन शरीफ़ में भी पाई जाती है। ‘जो लोग रूह के बारे में आपसे सवाल करते हैं, उनसे कहा दो कि रूह मेरे रब का हुक्म है।’ (अल-क़ुरआन- १७:८५) अर्थात, आत्मा यानि रूह को समझना इंसानी अक़्ल से बाहर है। रूह अल्लाह के हुक्म से जिस्म में दाख़िल और अल्लाह के हुक्म से जिस्म से बाहर निकलती है।

गीता के इस श्लोक पर ग़ौर करें:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिवेदना
(भगवद्गीता - २:२८)

भावार्थ यह कि, जितने सजीव प्राणी हैं वे सब शुरू में अव्यक्त थे। यानी, उनमें से कोई भी मौजूद नहीं था और उनका कोई रंगरूप भी नहीं था। बीच के जमाने में ये सब चीज़ें व्यक्त हुईं और आख़िर में ये सब फिर अव्यक्त यानी लुप्त हो जाएंगी। इसलिए, चिंता की कोई बात नहीं है।
क़ुरआन में यही बात इस तरह कही गई है:
‘इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन’
(अल-क़ुरआन- २:१५६)
अर्थात, हम सब अल्लाह ही के बंदे हैं और उसी की तरफ़ लौटने वाले हैं।

क़ुरआन और गीता में ऐसी बहुत-सी समानताएं हैं जो मानव जाति के लिए लाभकारी हैं। हिंदू मुस्लिम समाज अगर गहराई से अध्ययन करे तो दूरियां नहीं बल्कि दोनों में नज़दीक आने के कई कारण मिल जाएंगे। त्रेता युग में महर्षि वशिष्ठ ने भर्ग यानि अनंत प्रकाश को ग्रहण करने की बात कही है। क़ुरआन में भी प्रकाश का ध्यान बताया गया है। दरअसल सभी धर्मों का निचोड़ सनातन तत्व ज्ञान एक ही है। चाहे उसे किसी भी मज़हब या भाषा में कहा जाए। इसी बात को लोग समझ नहीं पा रहे हैं और शायद यही कारण है कि, ईर्ष्या और द्वेष की दीवार खड़ी हो रही है जो पूरी इंसानियत को पतन की ओर ले जा रही है। गीता हो या क़ुरआन, इंसान किसी के बताए रास्ते पर चले, वह रास्ता नेकी की ओर ही जाता है। ईश्वर और अल्लाह की ओर ही जाता है। इसलिए, आप चाहे गीता में आस्था रखते हों, या क़ुरआन में, दोनों की शिक्षाओं में एक-दूसरे का अक्स देखा जा सकता है। जरूरत है हिबा फ़ातिमा जैसी नेक भावना और सकारात्मक नज़रिए की।



(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)