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क्रिकेट, मज़हब और जाहिल पाकिस्तान / सैयद सलमान
Friday, October 29, 2021 - 9:48:30 AM - By सैयद सलमान

क्रिकेट, मज़हब और जाहिल पाकिस्तान / सैयद सलमान
क्रिकेट या कोई अन्य खेल महज़ खेल है, मज़हब का हिस्सा नहीं
​साभार- दोपहर का सामना 29 10 2021 ​

भारत-पाकिस्तान के बीच हुए टी-२० विश्वकप क्रिकेट मैच में पाकिस्तान जीत गया, लेकिन उसकी खेल भावना हार गई। बात पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों की नहीं, बल्कि दिन में ख़्वाब देखने वाले मूर्खों की उस जमात और की हो रही है जिनका देश एक मैच जीतकर मानो भारत का शासक बन गया हो। पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने फिर भी संयम का परिचय दिया। लेकिन भारतीय टीम पर पाकिस्तानी टीम की जीत को पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख रशीद इस्लाम की जीत बताने लगे। दुनिया भर के मुसलमानों को इस जीत की बधाई देते हुए शेख रशीद ने पाकिस्तान में लोगों को जश्न मनाने के लिए प्रेरित किया। शेख रशीद को यह अधिकार है कि वह अपने देश की जितनी चाहे तारीफ़ करें, लेकिन उन्हें भारत और इस्लाम को इसमें नहीं घसीटना चाहिए था। उनका यह कहना बेहद आपत्तिजनक लगा कि भारतीय मुसलमान भी पाकिस्तान की जीत चाह रहे थे। पाकिस्तानी गृह मंत्री का बयान पाकिस्तान में रह रहे लोगों की मानसिकता को साफ़ दर्शाता है। इसीलिए उस बात की तरफ़दारी करने का मन करता है जिसमें पाकिस्तान के साथ क्रिकेट न खेलने की सलाह दी जाती है।

एक ऐसा दौर था जब भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमी दोनों देशों के बीच हुए किसी भी क्रिकेट मैच के निर्णय को जंग में हुई हार-जीत के चश्मे से देखते थे। अब बड़ी संख्या में भारतीय अवाम और क्रिकेट प्रेमी उस दौर से बाहर निकल चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान में अभी भी लोग खेल को खेल भावना से नहीं लेते हैं। वह आज भी इसी मानसिकता से क्रिकेट मैच को देख रहे हैं जैसे यह दोनों देशों के बीच की जंग हो। जब पाकिस्तानी टीम की जीत हुई तो सबसे पहले गर्मजोशी से भारतीय टीम के खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी टीम के खिलाड़ियों को जीत की शुभकामनाएं दीं। जीत के बाद विराट की बाबर के कंधे पर हाथ रखे हुए और रिज़वान को गले लगाते हुए तस्वीरें जब वायरल हो रही थीं तब किसी ने नहीं सोचा था कि पाकिस्तानी टीम के कभी कप्तान रहे और उसी लोकप्रियता के दम पर प्रधानमंत्री बन चुके इमरान खान की टीम का गृहमंत्री ज़हर उगलता हुआ पाया जाएगा। वह तस्वीरें पूरी तरह भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की वास्तविकता नहीं हैं, लेकिन वही तस्वीरें हमारे देश के विशाल हृदय को प्रदर्शित करती हैं। खेल के मैदान में खेल भावना के नाम पर उफ़ान मारती देशभक्ति और चीख़ते दर्शकों को देखकर लग रहा था कि क्रिकेट कहीं इन्हें वहशी तो नहीं बना रहा, लेकिन यह तस्वीरें इस बात का प्रमाण हैं कि खेल के निर्णय में एक टीम जीती है तो दूसरे ने हार को बड़े दिल से और पूरी खेल भावना से स्वीकार किया है।

लेकिन उसी मैच में टीम इंडिया की हार का मलाल जब पूरे देश को हो रहा था तब राजस्थान के उदयपुर की एक स्कूल शिक्षिका का भारत की हार से ख़ुश होते हुए 'वी वॉन' और 'हम जीत गए' जैसे पाकिस्तान के समर्थन में स्टेटस लगाने पर सोचना पड़ता है कि कहीं यह कमी मुसलमानों में अभी भी बसी हुई तो नहीं है जो रह-रहकर सामने आती है। इसलिए शेख रशीद को कटघरे में जब भी खड़ा किया जाए तो उदयपुर की इस शिक्षिका जैसी मानसिकता को भी उसी में खड़ा करना ज़रूरी हो जाता है। ऐसे लोग ही शेख रशीद जैसे जाहिलों को ज़हर उगलने का साधन मुहैया कराते हैं। हालांकि इस पूरे मामले पर शिक्षिका ने सिर्फ़ मज़ाक़ में स्टेटस अपलोड करने की बात कहकर सफ़ाई देनी चाही है, लेकिन क्या एक शिक्षिका को मज़ाक़ की मर्यादा का ज़रा भी ख़्याल था? आख़िर कोई पढ़ा लिखा शख़्स भारत की हार पर कैसे खुश हो सकता है? ऐसे ही लोगों की वजह से कई जीत के नायक रहे मोहम्मद शमी पर इस बार हार का ठीकरा फोड़ने वाली जमात भी सक्रिय होती है। यह तो शुक्र है इस बार मोहम्‍मद शमी के ख़राब प्रदर्शन के बाद जब उन पर सोशल मीडिया के माध्‍यम से नस्‍लीय हमले होना शुरू हुए तब भारत के कई बड़े क्रिकेटर शमी के समर्थन में आ गए और उन्‍होंने ट्रोलर्स को जमकर लताड़ लगाई।

पाकिस्तान अगर ख़ुद को इस्लामी मुल्क समझता है तो पहले उसे अपने गिरेबान में झांकने की ज़रूरत है। इस्लाम में तो खेल कूद को लेकर भी बहुत कुछ नियम बनाए गए हैं। इस्लाम में क्रिकेट को भी व्यायाम के रूप में खेलने की अनुमति है, लेकिन उसे प्रयोजन बनाना, योग्य मक़सद की परवाह किए बिना उसमें शामिल होना या पैसे का निवेश कर लाभ कमाने की मंशा से क्रिकेट खेलना पूरी तरह जायज़ नहीं है। पाकिस्तान के ही एक प्रतिष्ठित संस्थान 'दारुल इफ़्ता जामिया उलूम इस्लामिया' का एक फ़तवा इसका उदहारण है। उस फ़तवे में प्रसिद्ध पाकिस्तानी मुस्लिम विद्वान, लेखक और मुहद्दिस मरहूम मोहम्मद यूसुफ़ लुधियानवी ने खेल को लेकर स्पष्ट किया है कि, किसी भी खेल की वैधता के लिए तीन शर्तें हैं। एक यह है कि, खेल का उद्देश्य सिर्फ़ व्यायाम या मनोरंजन हो। दूसरा, भले ही जो खेल पूरी तरह वैध हो लेकिन उस खेल को खेलने में कोई अवैधता नहीं होनी चाहिए। तीसरा, खेल को शरीयत के कर्तव्यों में कोताही या लापरवाही का कारण नहीं बनना चाहिए। इस मानक को ध्यान में रखा जाए तो अधिकांश खेल नाजायज़ और ग़लत दिखेंगे। पाकिस्तान के खेल प्रेमियों के लिए क्रिकेट पसंदीदा शगल बन गया है। मैच के दौरान न वे शिक्षा पर ध्यान देते हैं, न घर या कार्यस्थल के आवश्यक कामों की परवाह करते हैं। दीन का ढिंढोरा पीटने वाले पाकिस्तानी मुसलमानों में क्रिकेट के प्रति ऐसी दीवानगी पैदा हो गई है मानो पाकिस्तान के युवा सिर्फ़ क्रिकेट खेलने के लिए पैदा हुए हैं और इसके अलावा जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। फ़र्ज़ नमाज़ों को छोड़कर क्रिकेट खेलने या देखने में वक़्त जाया करने वाले धर्म के ठेकेदार पाकिस्तानी मुसलमान इस पर क्या कहेंगे?

एक बात और, क्या पाकिस्तान में क्रिकेट खेलने और देखने वालों ने यह आयत कभी पढ़ी है कि, "ईमान वालों की विशेषता यह है कि वे बेकार और फ़िज़ूल बातों से मुंह फेर लेते हैं।" (अल-क़ुरआन २३:०३) पाकिस्तानी इसका उलट करते हैं। क्या पाकिस्तानियों का ध्यान इस तरफ़ गया है कि क्रिकेट को एक खेल के रूप में खेलने के बजाय, एक नशा और स्थायी लक्ष्य बना दिया गया है। क्रिकेट में इस क़दर तल्लीन हो जाना कि शरीयत के मुताबिक़ फ़र्ज़ की उपेक्षा हो जाए, क्या इस्लामी नज़रिये से सही है? फिर आख़िर यह कौन सा इस्लाम है जो किसी देश से क्रिकेट जीतने के बाद फ़तह हो जाता है? कोई पाकिस्तानी अवाम और उसके गृहमंत्री से अगर यह सवाल कर ले कि "जनाब, क्या इस से पहले १२ बार वर्ल्ड कप में भारत से शिकस्त खाने पर इस्लाम की हार हुई थी?" क्या जवाब देंगे फिर ऐसे जाहिल? खेल में इस्लाम या कोई अन्य धर्म कहां से आ गया? इसलिए एक जाहिल मुल्क के जाहिल गृहमंत्री की जाहिलाना हरकत को दरकिनार कर देना चाहिए। खेल और मज़हब को जोड़ना इस्लामी नज़रिये से बिलकुल ग़लत है। अगर इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र की बात है, तो पहले पूरी तरह मुसलमान तो बन कर दिखाइए। क्रिकेट के माध्यम को केवल खेल रहने दें यहां तक तो ठीक है, लेकिन उसे धर्म बनाने की कोशिश करना सिवाय अधर्म के कुछ नहीं है। इस नशे में अगर भारत को खींचा जाता है तो जवाब सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। यहां के मुसलमानों को भी पाकिस्तान के साथ हुए मैच के दौरान एक देशप्रेमी की तरह अपनी टीम के साथ खड़े होना चाहिए न कि मज़हब की बुनियाद पर पाकिस्तान के साथ। क्योंकि क्रिकेट या कोई अन्य खेल महज़ खेल है, मज़हब का हिस्सा नहीं।



(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)