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गुजरात का चुनाव और मुसलमान / सैयद सलमान
Friday, November 11, 2022 9:06:30 PM - By सैयद सलमान

गुजरात का मुसलमान किसी न किसी कारण से चर्चा में रहता है
साभार- दोपहर का सामना 11 11 2022

गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर पूरा देश उत्सुक है। १८२ सदस्यीय गुजरात विधानसभा के लिए १ और ५ दिसंबर को मतदान होगा। इसके बाद ८ दिसंबर को चुनाव का नतीजा आएगा। इस बार मुक़ाबला भाजपा, कांग्रेस और आप के बीच त्रिकोणीय होने के आसार हैं। गुजरात विधानसभा का कार्यकाल १८ फरवरी २०२३ को समाप्त हो रहा है। इस बार ४.९ करोड़ मतदाता गुजरात चुनाव में वोट डालेंगे। १ अक्टूबर, २०२२ तक १८ साल के होने वाले युवाओं को भी वोटिंग का मौक़ा दिया जा रहा है। पहली बार मतदान करने वालों पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। कुल ४. ६ लाख वोटर ऐसे हैं, जो पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। राज्य में मतदान के लिए कुल ५१, ७८२ केंद्र बनाए जाएंगे। मुस्लिम मतदाताओं के बीच अभी भी मतदान को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। २००२ के दंगों के बाद से गुजरात का मुसलमान किसी न किसी कारण से चर्चा में रहता है। कभी मज़लूम बनकर, कभी विरोध का प्रतीक बनकर, कभी मात्र वोटबैंक बनकर। उसे आगे रखकर कई राज्यों में मुसलमानों की दुर्दशा की कहानियां सुनाई जाती हैं और उसी पर मुस्लिम राजनीति होती है। वैसे गुजरात में मुस्लिम समुदाय का वोट बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य विधानसभा की ३५ से ३८ सीटों पर मुस्लिम वोट नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। पूरे गुजरात में २५ विधानसभा सीटें ऐसी हैं जो मुस्लिम बाहुल्य मानी जाती हैं। मुसलमानों का वोट आमतौर पर कांग्रेस का कोर वोटबैंक माना जाता रहा है, लेकिन उसमें इस बार आप और एमआईएम भी सेंध लगाने की तैयारी में है। एमआईएम ने मुस्लिम बहुल इलाक़ों में अपने प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस का चुनावी समीकरण बिगाड़ दिया है। भाजपा ने भी पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने की रणनीति तैयार की है।

गुजरात के अहमदाबाद, पंचमहल, खेड़ा, आनंद, भरूच, नवसारी, साबरकांठा, जामनगर और जूनागढ़ जैसे कई इलाक़ों में मुस्लिम मतदाताओं का ख़ासा प्रभाव माना जाता है। ऐसी धारणा है कि २०१७ के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का कांग्रेस की तरफ़ रुझान २०१२ के मुक़ाबले कम हुआ था। लेकिन इस बार कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं पर अपनी खोई हुई पकड़ को मज़बूत करने में जुटी है। गोधरा दंगे के बाद मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव सबसे ज़्यादा कांग्रेस की तरफ़ ही था। किसी अन्य ताक़तवर क्षेत्रीय पार्टी के न रहने के कारण कांग्रेस के साथ ही जाना उसकी मजबूरी भी होती है। गुजरात राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की आबादी लगभग १० फ़ीसदी के आस-पास है, लेकिन राज्य की विधानसभा में कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। यह जानना भी रोचक है कि अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात एकमात्र ऐसा राज्य है जहां पर मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव भाजपा की तरफ़ भी है। खुद देश के गृह मंत्री अमित शाह का मानना है कि गुजरात में २० फ़ीसदी मुस्लिम मतदाता भाजपा को मतदान करते हैं। यह कितना सत्य है यह तो वही जानें, लेकिन चाहे डर कहिए, रणनीति कहिए या समीकरणों का खेल कि गुजरात में मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि भाजपा ने १९८० में अपनी स्थापना के बाद से गुजरात में हुए सभी नौ विधानसभा चुनावों में सिर्फ़ एक बार ही एक मुसलमान को उम्मीदवार बनाने का रिकॉर्ड बनाया है। पिछले २७ सालों से राज्य की सत्ता पर क़ाबिज़ भाजपा ने आख़िरी बार १९९८ में भरूच जिले की वागरा विधानसभा सीट पर एक मुसलमान उम्मीदवार उतारा था, जिसे हार का सामना करना पड़ा था। विपक्ष इसे भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति से जोड़कर देखता है और आरोप लगाता है कि भाजपा मुसलमानों को टिकट से दूर रखना चाहती है, वरना इतने वर्षों में क्या उसे सिर्फ़ एक ही मुसलमान टिकट देने योग्य मिला? जबकि भाजपा का जवाब होता है कि भाजपा जीत की क्षमता के आधार पर भविष्य में मुसलमानों को भी टिकट देगी। मुसलमानों को उम्मीदवार बनाने के मामले में भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस का रिकॉर्ड बेहतर रहा है। वर्ष १९८० से २०१७ तक हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने कुल ७० मुसलमान नेताओं को उम्मीदवार बनाया और इनमें से ४२ ने जीत दर्ज की। लेकिन मुस्लिम राजनीति के जानकार मानते हैं कि उनकी आबादी के अनुरूप उन्हें टिकट देने में कांग्रेस ने भी कंजूसी ही बरती है।

महंगाई, बेरोज़गारी, धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देने के मामलों से घिरी भाजपा इस बार मुस्लिम वोटों को भी साधना चाहती है। लेकिन फिर भी उसे टिकट नहीं देना चाहती। बजाय इसके वह 'अल्पसंख्यक मित्र' कार्यक्रम के ज़रिए बूथ और ज़िला स्तर पर मुसलमानों को पार्टी से जोड़ रही है। वह मुसलमानों को समझाना चाहती है कि इस योजना के माध्यम से उन्हें केंद्र और राज्य सरकार की सभी योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा। गुजरात को ऐसा राज्य माना जाता है जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को लेकर काफ़ी संवेदनशील रहा है। मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा तबक़ा भले ही कांग्रेस के प्रति झुकाव रखता हो लेकिन इस बार केजरीवाल और ओवैसी की दावेदारी से समीकरण कुछ हद तक बदल सकते हैं। मुस्लिम वोट बैंक में इस सीधे-सीधे बंटवारे से भाजपा को ही फ़ायदा होगा। दिल्ली में मुस्लिम मतदाताओं के लिए पहली पसंद बन चुकी 'आप' के गुजरात में उतरने से कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है। वह गुजरात में सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है। जबकि ओवैसी भी मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़कर पूरा गणित बिगाड़ेंगे। वैसे केजरीवाल को लेकर मुसलमानों में अब बेचैनी है। नोटों पर श्रीगणेश और लक्ष्मी जी की फ़ोटो लगाने की मांग कर उन्होंने सॉफ़्ट हिंदुत्व कार्ड चला था। वह जानते हैं कि सिर्फ़ मुसलमानों का वोट पाकर वह सरकार नहीं बना सकते हैं। इसलिए वह हिंदू मतों को साधना चाहते हैं। उनको लगता है कि भाजपा को हराने के लिए मुसलमान हर हाल में उनके पास आएगा। शायद मुसलमानों को यही बात खल रही है।

वर्ष २००२ के बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार मामले में ११ दोषियों की रिहाई पर लेकर जारी विवाद भी इस बार के चुनाव में ज़ाहिर न सही छुपा मुद्दा होगा। मुसलमानों के पक्षधर इसे हर हाल में भुनाना चाहेंगे। ओवैसी को ऐसे संवेदनशील मुद्दे पकड़ने में महारत हासिल है। हालांकि उनके तर्कों में संविधान की बात भी होती है। लेकिन गुजरात के मुसलमान किसी को हराने वाले नहीं, ख़ुद जीतने वाले उम्मीदवारों को वोट देने की कोशिश करेंगे। अगर ऐसा होता है तो ओवैसी वोट कटवा पार्टी बनकर रह जाएंगे। गुजरात दंगों की बात उठती है तो लाभ भाजपा को ही होता है। दंगों के बाद जब गुजरात विधानसभा चुनाव हुए तब भाजपा को उन इलाक़ों में बड़ी जीत मिली थी, जहां ज़्यादा दंगे हुए थे। दंगों से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों की ६५ सीटों में से ५३ सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। इसलिए कांग्रेस सीधे उस मुद्दे को उठाकर ध्रुवीकरण करना नहीं चाहेगी। तब आख़िर मुसलमान क्या करेगा? सॉफ़्ट हिंदुत्व वाली आप नहीं, हार्ड लाइनर एमआईएम नहीं तो फिर उसके पास ग़ैर भाजपा पार्टियों में फिर वही कांग्रेस एकमात्र विकल्प बचती है। राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो' यात्रा ने यूं तो कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया है, लेकिन गुजरात का मुसलमान पहले अपनी सुरक्षा को महत्व देगा और देना भी चाहिए। मुसलमानों को राजनीतिक रूप से परिपक्व होकर अपनी राह चुननी होगी। अतीत में उलझकर वह अपना ही नुक़सान करेंगे। वर्ष २००२ के दंगों से लोग बाहर तो निकल चुके हैं लेकिन बिलक़ीस बानो मामले ने उनके घाव हरे कर दिए हैं। भाजपा को यह बात सुहाती है, क्योंकि तब ध्रुवीकरण आसान हो जाता है। मुसलमानों को अब विकास, बेरोज़गारी, ग़रीबी, सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े सवाल पूछते हुए सामने उपलब्ध सबसे बेहतर विकल्प को चुनने की रणनीति पर काम करना चाहिए।



(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)