Sunday, November 28, 2021

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और भी ग़म हैं ज़माने में.… / सैयद सलमान
Friday, November 19, 2021 9:32:46 AM - By सैयद सलमान

सत्तालोभी और प्रचार का भूखा वसीम रिज़वी कोई दूध का धुला शख़्स नहीं है
साभार​- दोपहर का सामना 19 11 2021 ​

साल २०२२ में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं। तैयारियां ज़ोंरों पर है। ऐसे में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो ज़ाहिर या ग़ैर-ज़ाहिर तौर पर अपने राजनीतिक आक़ाओं की मदद के लिए विवाद पैदा करने की जुगत में होते हैं। इनका काम 'हिडन एजेंडा' चलाना होता है। ऐसा ही एक विवादित नाम है वसीम रिज़वी का, जिसका मक़सद होता है मुस्लिम समाज के बीच नफ़रत के बीज बोकर उन्हें उकसाया जाए और अपनी राजनीतिक रोटी सेंकी जाए। फ़िलहाल वसीम ने एक किताब लिखी है जिसको लेकर विवाद जारी है। वसीम रिज़वी का दावा है कि उसकी 'मोहम्मद' नाम से लिखी गई किताब पैग़ंबर मोहम्मद साहब के चरित्र पर आधारित है। उसका यह भी दावा है कि किताब पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित है और इसे लिखने के लिए उसने ३०० से ज़्यादा किताबों और मुस्लिम ग्रंथों का संदर्भ लिया है। किताब के विरोध पर वसीम रिज़वी का जवाब होता है कि विरोध करने वालों को पहले ये किताब पढ़ लेनी चाहिए। वह इतने पर ही नहीं रुका बल्कि उसने अपनी एक वसीयत बनाई है जिसके अनुसार उसके मरने के बाद उसे मुस्लिम क़ब्रिस्तान में दफ़न करने के बजाय हिंदू श्मशान घाट पर जलाया जाए। न जाने क्यों वसीम रिज़वी की इस वसीयत पर मुस्लिम समाज में और भी ज़्यादा नाराज़गी फैल गई है।

इस पूरे घटनाक्रम में वसीम का किरदार संदेहास्पद है। दरअसल पैग़ंबर मोहम्मद साहब को लेकर दुनिया भर के मुसलमानों की ज़बरदस्त आस्था है। मुस्लिम समाज की धारणा है कि मोहम्मद साहब ने जाति, धर्म, वंश, नस्ल आदि के बंधनों से ऊपर उठ कर सभी इंसानों के लिए सफल शांतिमय जीवन, मोक्ष और निजात का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे में वसीम रिज़वी ने उनके बारे में नकारात्मक बातें लिखकर दुनिया के तमाम मुसलमानों के जज़्बातों को ठेस पहुंचाने का काम किया। वैसे भी यह पहला मौक़ा नहीं है जब वसीम ने मुस्लिम धर्म के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाया हो। वसीम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखकर मदरसों को बंद करने मांग की थी। रिज़वी का तर्क था कि मदरसों में पढ़ाई के नाम पर मज़ाक़ हो रहा है। कुछ संगठन और कट्टरपंथी मुसलमान बच्चों को सिर्फ़ मदरसे में पढ़ाने की बात कहकर अपनी दुकान चला रहे हैं। मुसलमान बच्चों से शिक्षा का हक़ छीन रहे हैं। तब यह माना गया था कि वह प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की नज़दीकी पाने के लिए ऐसी मांग कर रहा है। उसकी तब योगी सरकार में पूछ भी बढ़ गई थी। या यूं कहें कि बुलबुल ख़ुद सैयाद के शिकंजे में आ गई।

वसीम रिज़वी ने मदरसों पर हमला बोलने के बाद मुसलमानों के लिए बेहद पवित्र धर्मग्रंथ क़ुरआन को भी नहीं बख्शा। वसीम ने सुप्रीम कोर्ट में २६ आयतों को क़ुरआन से हटाने की याचिका दायर की थी। उसने क़ुरआन की कुछ आयतों को आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली बताते हुए दावा किया था कि इन आयतों को क़ुरआन में बाद में शामिल किया गया। क़ुरआन शरीफ़ पर सभी मुस्लिम फ़िरक़ों का एक मत है। मुसलमानों की आस्था है कि क़ुरआन आसमानी किताब है और इसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता। मुसलमान मानते हैं कि क़ुरआन से इंसानियत और शांति का संदेश मिलता है। वसीम के इस क़दम से मुसलमानों के हर मसलक में रोष फैला। वह एक बार फिर मुसलमानों के जज़्बात से खेलने में कामयाब हो गया और मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबक़ा उसके बयानों से आहत होकर उस पर कार्रवाई की मांग करते हुए घूमने लगा। वसीम यही चाहता था कि मुस्लिम समाज बेचैन होकर सड़कों पर उतरे और ख़ून-ख़राबा हो। यह किसके इशारे पर हो रहा था यह भी किसी से छिपा नहीं था, लेकिन मुस्लिम समाज ने तब सब्र से काम लिया और न्यायालय पर विश्वास क़ायम रखा। आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने क़ुरआन की आयतों के ख़िलाफ़ दाख़िल याचिका को ख़ारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने वसीम पर पचास हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगाया। इस याचिका को लेकर कई मुस्लिम संगठनों के साथ-साथ खुद वसीम के परिवार के लोग भी उसके ख़िलाफ़ हो गए थे। उसके अपने परिवार ने भी वसीम से रिश्ता तोड़ लेने का ऐलान कर दिया था। वसीम के सगे भाई ने सार्वजनिक रूप से सामने आकर कहा था कि वसीम से उसकी मां, बहन और मेरा अब कोई रिश्ता नहीं है।

सत्तालोभी और प्रचार का भूखा वसीम रिज़वी कोई दूध का धुला शख़्स नहीं है। शिया वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन रहे वसीम पर वक़्फ़ की संपत्तियों को हड़पने, ख़ुर्द-बुर्द करने और बोर्ड में भ्रष्टाचार करने के कई गंभीर आरोप हैं। वसीम रिज़वी से जुड़े दो मामलों की सीबीआई जांच चल रही है। उस पर क़ानूनी शिकंजा कसने की संभावना बढ़ गई थी। वह पूरी तरह अपने आक़ाओं के आगे नतमस्तक था। एक व्यक्ति जो नाम देखकर मुस्लिम समाज का लगता हो और मुसलमानों और उनकी आस्था के ख़िलाफ़ खुलकर बोलता हो वह किसी ना किसी के लिए तो फ़ायदेमंद होगा ही। उन्हीं शक्तियों ने वसीम को अपने इशारे पर नचाना शुरू कर दिया। जिसे उसके समाज और परिवार ने ठुकरा दिया हो, उसी वसीम रिज़वी को मोहरा बनाया गया। रह-रह कर वसीम की तरफ़ से खेले जा रहे मुस्लिम कार्ड से मुसलमानों की आंखें खुल जानी चाहिए थीं, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। मुसलमान फिर वसीम की किताब के बहाने सड़कों पर उतर आया। इस बीच त्रिपुरा के दंगों ने भी सामाजिक विद्वेष फैलाने में मदद की। महाराष्ट्र की सत्ता से बेदख़ल हुई शक्तियों ने भी इसका लाभ उठाया और कुछ इलाकों में हिंसा फैली। मुसलमानों को इतनी सी बात न जाने क्यों समझ में नहीं आई कि बार-बार उनके जज़्बात से खेलकर उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों की आगामी चुनावी वैतरणी पार करने की यह सारी क़वायद है।

कुरआन की सीख है, "ला इकराहा फ़िद्दीन" (अल-कुरआन २:२५६) यानी "मज़हब में ज़ोर-ज़बरदस्ती की गुंजाइश नहीं।" साथ ही क़ुरआन की सीख है "लकुम दीनुकुम वलिय दीन" (अल-क़ुरआन १०९:६) यानी "तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन।" क्या मुसलमानों ने इन आयतों को समझने की कोशिश की है? वसीम रिज़वी को उसके अपने समाज और परिवार ने बाहर कर रखा है। न भी किया होता तो उसे अपने मज़हब को छोड़ने या उस पर क़ायम रहने की संवैधानिक आज़ादी है। उस पर किसी भी तरह की ज़बरदस्ती आख़िर क्यों? साथ ही उसे अपना दीन चुनने की भी आज़ादी है। हिकमत और मसलेहत नबी की सुन्नत हैं। इसलिए वसीम की बातों को दरगुज़र करना मुसलमानों की मसलेहत का हिस्सा होना चाहिए। उसकी बातों पर प्रतिक्रिया देना दरअसल उसे महत्व देना होगा। क्या वसीम मुसलमानों के लिए इतना महत्वपूर्ण है? मुसलमानों की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षणिक समस्याएं वसीम रिज़वी की समस्या से कहीं बड़ी हैं। मुस्लिम समाज सालों से भारतीय संस्कृति और देश का हिस्सा हैं। उन्हें अपने विकास पर लक्ष्य केंद्रित करने की ज़रूरत है। उन्हें अपनी ज़मीनी और बुनियादी समस्याओं से अपनी आने वाली पीढ़ी को निजात दिलाने की ज़रूरत है। मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वह राजनीतिक औज़ार के रूप में अपना इस्तेमाल न होने दें। बेहतर होगा कि देश के मुसलमान अपनी समस्याओं को समझें और उसका समाधान निकालने की जद्दोजेहद करें। वसीम रिज़वी जैसे किसी एक नकारात्मक व्यक्ति के बहाने सामाजिक ध्रुवीकरण के खेल में शामिल होना उनके लिए आत्मघाती क़दम होगा। मुस्लिम समाज यह न भूले कि, 'और भी ग़म हैं ज़माने में वसीम रिज़वी के सिवा।'



(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)