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मुसलमान की पहचान है अच्छा और सच्चा होना / सैयद सलमान
Friday, April 16, 2021 11:16:59 AM - By सैयद सलमान

‘ऐ ईमानवालों! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर किए गए थे, ताकि तुम डर रखनेवाले बन जाओ।’ – (अल- क़ुरआन- २:१८३)
साभार- दोपहर का सामना  16 04 2021

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों और सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘ब्रेक द चेन’ अभियान के बीच बुधवार से पाक महीने रमज़ान की शुरुआत हो गई है। इस पूरे माह मुस्लिम धर्मावलंबी रोज़ा रखते हैं, नमाज़ों का पूरी समर्पण भावना से एहतेमाम करते हैं, पंजवक़्ता नमाज़ों के अलावा रमज़ान की विशेष नमाज़ तरावीह पढ़ते हैं और क़ुरआन की तिलावत की पाबंदी करते हैं। इस्लाम धर्म और मुसलमानों के लिए रमज़ान का महीना बहुत ही पाक और विशेष महत्व रखनेवाला होता है। मुसलमानों का मानना है कि रमज़ान महीने में ही लगभग १४०० वर्ष पहले पैग़म्बर मोहम्मद साहब के सामने इस्लाम की पवित्र पुस्तक क़ुरआन की पहली आयत का अवतरण हुआ था। और उस पहली आयत का पहला लफ़्ज़ था ‘इक़रा’ अर्थात ‘पढ़’। इस्लामी किताबों की मान्यता है कि रमज़ान के महीने में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और जहन्नुम के दरवाज़े बंद हो जाते हैं। माना जाता है कि इस महीने रोज़ा रखने वाले रोज़ेदारों को कई गुना सवाब मिलता है। मुस्लिम समाज इसे अल्लाह की इबादत का पर्व मानता है। क़ुरआन में रोज़ा रखना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी बताया गया है। ‘ऐ ईमानवालों! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर किए गए थे, ताकि तुम डर रखनेवाले बन जाओ।’ – (अल- क़ुरआन- २:१८३)

इस्लामी हिजरी कैलेंडर के अनुसार साल का नौवां महीना रमज़ान का होता है। इसकी शुरुआत चांद पर निर्भर करती है। रमज़ान का चांद दिखते ही रोज़े रखने शुरू हो जाते हैं। चांद के दिखने के बाद से ही मुस्लिम समुदाय के लोग सुबह के समय सहरी खाकर इबादतों का सिलसिला शुरू कर देते हैं। इसी दिन पहला रोज़ा रखा जाता है। सूरज निकलने से पहले खाए गए खाने को ‘सहरी’ कहा जाता है। सूरज ढलने के बाद रोज़ा खोलने को ‘इफ़्तार’ कहा जाता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार, ६१० ईसवी में पैग़ंबर मोहम्मद साहब पर लैलत-उल-क़द्र के मौक़े पर पवित्र क़ुरआन शरीफ़ नाज़िल हुई थी, जो इस्लाम का पवित्र धार्मिक ग्रंथ है। तब से रमज़ान माह को इस्लाम में पाक माह के रूप में मनाया जाने लगा। रमज़ान का ज़िक्र क़ुरआन में भी कई जगह मिलता है। क़ुरआन में ज़िक्र है कि रमज़ान माह में अल्लाह ने पैग़ंबर मोहम्मद साहब को अपने दूत के रूप में चुना। इसीलिए रमज़ान का महीना मुसलमानों के लिए और अधिक पाक माना जाता है।

रमज़ान के महीने को और तीन हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से में दस-दस दिन आते हैं। हर दस दिन के हिस्से को ‘अशरा’ कहते हैं, जिसका मतलब अरबी में ‘दस’ है। पहला अशरा यानी पहले रोज़े से दसवें दिन तक रहमत का अशरा कहा जाता है। रमज़ान के महीने के पहले १० दिन रोज़ा रखनेवालों पर अल्लाह की ख़ूब रहमत होती है। इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुसार इन १० दिनों में अधिक से अधिक दान करना चाहिए। ज़रूरतमंदों और ग़रीबों की सहायता करनी चाहिए। दूसरा अशरा यानी ११ से २० दिन गुनाहों की माफ़ी का अशरा माना जाता है। इन १० दिनों में ख़ूब इबादत कर अल्लाह से अपने किए गए गुनाहों की माफ़ी मांगी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि दूसरे अशरे के दौरान जो भी व्यक्ति अपने गुनाहों की माफ़ी मांगता है, उसे उसके गुनाहों की माफ़ी अल्लाह से ज़रूर मिलती है। रमज़ान का तीसरा अशरा यानी २१ से ३० दिन का अंतिम अशरा जहन्नम की आग से ख़ुद को बचाने के लिए होता है। इस्लाम में इसे भी काफ़ी महत्वपूर्ण माना गया है। इस दौरान हर कोई अल्लाह की इबादत कर जहन्नुम से बचने की दुआ मांगता है। रमज़ान के आख़िरी अशरे में कई मुस्लिम मर्द और औरतें एतक़ाफ़ में बैठते हैं। मर्द मस्जिदों में बैठते हैं और वहीं इबादत में मशग़ूल रहते हैं। एहतक़ाफ़ को भी बड़ी नेकी माना गया है।

इस मुबारक महीने में किसी तरह के झगड़े या ग़ुस्से से न सिर्फ़ मना फ़रमाया गया है, बल्कि किसी से गिला-शिकवा है तो उससे माफ़ी मांगकर समाज में एकता क़ायम करने की सलाह दी गई है। इसके साथ एक तय रकम या सामान ग़रीबों में बांटने की हिदायत है, जो समाज के ग़रीब लोगों के लिए बहुत ही मददगार है। इसे ज़कात कहा जाता है। ज़कात का ज़िक्र भी क़ुरआन में कई जगह आया है। रोज़ा सिर्फ़ भूखे, प्यासे रहने का नाम नहीं बल्कि ख़ुद पर नियंत्रण करना, ग़लत काम से बचना, दंगे-फ़साद से दूर रहना यानी हर तरह के गुनाहों से ख़ुद को बचाना है। इसका मतलब हमें हमारे शारीरिक और मानसिक दोनों के कार्यों को नियंत्रण में रखना है। कहते हैं मंज़िल पर पहुंचना तब आसान हो जाता है जब राह सीधी हो। इस्लाम में रोज़ा रहमत और राहत का ‘राहबर’ यानि ‘पथ-प्रदर्शक’ है। रहमत से आशय अल्लाह की मेहरबानी से है और राहत का मतलब दिल के सुकून से है। अल्लाह की रहमत होती है तभी दिल को सुकून मिलता है। दिल के सुकून का त’अल्लुक़ चूंकि नेकी, नेक अमल और सत्कर्म से है, इसलिए ज़रूरी है कि इंसान नेकी के रास्ते पर चले। दरअसल रोज़ा बुराइयों पर लगाम लगाता है और सीधी राह चलाता है। वैसे तो रोज़ा है ही सब्र और हिम्मत-हौसले का पयाम लेकिन रोज़ा सीधी राह का भी एहतिमाम सिखाता है। नेक-नीयत से रखा गया रोज़ा नूरानियत की निशानी है। अच्छा और सच्चा होना असल मुसलमान की पहचान है। पवित्र क़ुरआन के अनुसार ‘अल्लाह जिसे चाहता है, सीधे मार्ग पर चलाता है।’ -(अल- क़ुरआन- २:२१३)

इस्लाम कहता है कि मग़फ़िरत अर्थात मोक्ष पाना है तो उसकी मंज़िल पर पहुंचने के लिए सीधी राह रोज़ा है। जब अल्लाह का ख़ुद फ़रमान है कि वह जिसे चाहे सीधी राह दिखाए, उसके संदर्भ में यही बात है कि रोज़ा सीधी राह है। यानी रोज़ा रखकर जब कोई शख़्स अपने ग़ुस्से, लालच, ज़बान, ज़ेहन और नफ़्स अर्थात इंद्रियों पर क़ाबू रखता है तो वह सीधी राह पर ही चलता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है रोज़ा भूख-प्यास पर नियंत्रण तो कराता ही है, घमंड, फ़रेब, छल-कपट, झगड़े-फ़साद, बेईमानी, बदनीयती, बदग़ुमानी, बदतमीज़ी पर भी नियंत्रण करना सिखाता है। रोज़े के दौरान सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहने का ही नियम नहीं है, बल्कि आंख, कान और जीभ का भी रोज़ा रखा जाता है यानी न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा कहें। इसके साथ ही इस बात का भी ध्‍यान रखें कि आपके द्वारा बोली गई बातों से किसी की भावनाएं आहत न हों।

याद रखें पूरे रमजान में रोज़े रखना, नमाज़ पढ़ना, तिलावत करना और अल्लाह का शुक्र अदा करना अगर नेकी है तो, सदक़ा, फ़ितरा, ज़कात देना भी अल्लाह की इबादत है। बिल्कुल उसी तर्ज़ पर ख़ुद को कोरोना के संक्रमण से बचाते हुए औरों को संक्रमित न करना भी तो एक तरह की नेकी ही हुई। अल्लाह का धन्यवाद अदा करते हुए इस नेकी को निभा ले गए तो इस मुक़द्दस महीने के गुज़रने के बाद शव्वाल की पहली तारीख़ को ईद उल-फ़ित्र मनाई जाएगी। यानी ईश्वर ने हर नेकी का इनाम तय कर रखा है। पिछले वर्ष की तरह इस साल भी अगर पवित्र रमज़ान माह की आमद कोरोना के बढ़ते प्रभाव के बीच हुई है तो इस रमज़ान के दौरान भी सोशल डिस्टेंसिंग, सेनिटाइज़ेशन और मास्क का उपयोग ज़रूरी हो जाता है। सरकार द्वारा तय किए गए नियमों का उल्लंघन न होने पाए इस बात का ख़ास ख़्याल रखना होगा। कोरोना वायरस को हराने के लिए सबको एकजुट होकर सरकार के ‘ब्रेक द चेन’ अभियान का पालन करना होगा। बार-बार इस बात को समझाया जा रहा है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा या महामारी का कोई धर्म नहीं होता। प्राकृतिक आपदा, आफ़त, बला, परेशानी, महामारी धर्म देखकर किसी पर न रहम करती है न ही क्रूरता दर्शाती है, इसलिए सुरक्षित रहकर औरों को सुरक्षित रखने में मदद करना भी एक तरह का सदक़ा-ए-ज़ारिया है।


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)