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ग़लतियों को सुधारने का समय- क्या जागरूक कर पाएगी आयशा की मौत? / सैयद सलमान 
Friday, March 5, 2021 9:49:51 AM - By सैयद सलमान

आयशा के दुनिया से जाने के बाद आयशा, आयशा की आत्महत्या और आयशा के ही बहाने मुस्लिम समाज में दहेज के बढ़ते चलन और शादी-ब्याह में की जाने वाली पैसों की नुमाइश पर खुलकर चर्चा की जा रही है।
साभार- दोपहर का सामना 05 03 2021

अहमदाबाद की एक घटना ने केवल मुस्लिम समाज ही नहीं बल्कि देश के हर माता-पिता और जागरूक नागरिकों को झकझोर कर रख दिया है। अहमदाबाद की आयशा आरिफ़ खान के ज़रिए साबरमती नदी में छलांग लगा कर आत्महत्या किए जाने की ख़बर से ऐसा कोई नहीं होगा जो द्रवित नहीं हुआ हो। आयशा ने नदी में कूदने से पहले एक भावुक वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया था। वीडियो के संदेश को ग़ौर से समझा जाए तो यही प्रतीत होता है कि आत्महत्या से पहले आयशा ने हंसते हुए जो वीडियो बनाया था उस हंसी के पीछे भयानक दर्द छुपा हुआ था। आयशा की मौत के बाद उस दर्द की परतें जब धीरे-धीरे खुलीं तब उसके पति का ज़ुल्म सामने आया। राजस्थान के जालौर के रहने वाले आरिफ़ से आयशा की शादी २०१८ में हुई थी। आरिफ़ का किसी लड़की से प्रेम-प्रसंग चल रहा था। प्रेमिका पर पैसे लुटाने के लिए ही वह आयशा के पिता से रुपयों की मांग करता था। आयशा ३ साल सब सहती रही। डिप्रेशन के चलते गर्भ में ही उसने अपना बच्चा तक खो दिया। पति की शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से तंग होकर आयशा पिछले एक साल से पति से अलग अपने घर पर रह रही थी। आख़िर जब वह मानसिक रूप से हार गई तब २५ फ़रवरी को मरने से पहले दो मिनट का वीडियो संदेश देकर उसने नदी में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।

अब लोग आयशा की आत्महत्या पर ख़फ़ा हैं। सभी इस बात पर अपने ग़ुस्से का इज़हार कर रहे हैं कि अपने दहेज लोभी पति और ससुराल वालों की दिन-प्रतिदिन बढ़ती मांगों के कारण आयशा को आत्महत्या जैसा घृणित कार्य करने पर मजबूर होना पड़ा है। इस्लाम की नज़र में आत्महत्या केवल घृणित ही नहीं बल्कि हराम भी है। हालांकि आयशा के दुनिया से जाने के बाद आयशा, आयशा की आत्महत्या और आयशा के ही बहाने मुस्लिम समाज में दहेज के बढ़ते चलन और शादी-ब्याह में की जाने वाली पैसों की नुमाइश पर खुलकर चर्चा की जा रही है। महंगी शादियां, बेतहाशा ख़र्च, झूठी शान का प्रदर्शन और बड़ी-बड़ी उम्मीदों ने शादियों को टिकाऊ, लंबी चलने वाली और भरोसेमंद न होकर एक इवेंट की शक्ल दे दी है। इस इवेंट में किसी बेटी के बाप का दर्द कोई समझने को तैयार नहीं है। पिछले कई वर्षों से चली आ रहे दहेज, शादियों में स्टेटस सिंबल के नाम पर होने वाले भोंडेपन और विकृति पर आयशा मामले ने एक बार फिर से सोचने की दिशा दी है।

इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो कि इस्लाम में जहां निकाह को बहुत ही आसान और सरल बनाया गया है वहीं कुछ लालची और दहेज लोभियों ने निकाह और शादी-ब्याह को बहुत ही पेचीदा और जटिल बना दिया है। इस्लामी क़ानून में शादी के बाद पत्नी का पालन पोषण, उसके रहने आदि के लिए घर का इंतज़ाम वग़ैरह पति के ही सुपुर्द किया गया है। इसके अलावा शरीयत में निकाह करने के बाद पति को आदेश दिया गया है कि वह पत्नी को मेहर अदा करे। घर में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं का भी प्रबंध करने की ज़िम्मेदारी पति के ही ज़िम्मे है। अब अगर बात दहेज की है तो दहेज मांगने वालों को इस आयत पर ग़ौर करना चाहिए जिसमें कहा गया है कि ‘अल्लाह का डर रखो, जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे के सामने मांगें रखते हो। और नाते-रिश्तों का भी तुम्हें ख़याल रखना है। निश्चय ही अल्लाह तुम्हारी निगरानी कर रहा है। (अल-​क़ुरआन ०४:०१)’ क्या कोई सच्चा मुसलमान इस आयत को पढ़कर किसी मजबूर बाप के सामने उसकी बेटी के साथ-साथ दहेज मांगने की हिमा​क़​त करेगा? लड़की की विदाई के साथ दहेज का सारा सामान देने का जो रिवा​ज़​ चल रहा है, वह इस्लामी शरीयत के बिलकुल ​ख़िलाफ़ है। इस नज़रिये से आयशा के पति का कृत्य पूरी तरह ​ग़ैर इस्लामी है और उसे ​सख़्त से ​सख़्त ​सज़ा मिलनी चाहिए।

यही नहीं, एक हदीस (​बुख़ारी शरी​फ़​, अध्याय- विवाह ६२:२९) में विस्तार से वर्णन है कि हज़रत उरवा ने उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा से सूरह निसा की आयत ‘अगर तुम्हें डर हो कि तुम उनके साथ न्याय नहीं कर सकोगे तो फिर उनसे विवाह मत करो.. (अल-​क़ुरआन ०४:०३)’ के नाज़ि​ल​ होने का कारण पूछा, तो हज़रत आयशा ने बताया कि ये आयत अनाथ लड़कियों का संरक्षण करने वाले उन पुरुषों के लिए नाज़ि​ल​ हुई जो उन लड़कियों से प्रेम के कारण नहीं बल्कि उनकी सुंदरता और उनकी धन संपत्ति हड़पने की ​फ़िराक़ मे उनसे विवाह करना चाहते थे। यानि इस्लाम में लड़कियों से दहेज मिलने के लालच या फिर उनकी सुंदरता के लोभ में विवाह करने की अनुमति बिलकुल नहीं है। जबकि होता इसके बिलकुल उलट है। शादी के बाद कम दहेज लाने को लेकर ससुराल मे मिलने वाली मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को परिवार की मान मर्यादा बनाए रखने के लिए लड़की पर ही हर ओर से दबाव डाला जाता है। बात यदि केवल शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना के बाद ​ख़​त्म हो जाती तब भी ​ग़​नीमत थी, पर ऐसा होता नहीं। अक्सर दहेज हत्या, बहू को जलाकर मार डालने के मामले तो सामने आते ही रहते थे, लेकिन आयशा के मामले ने तो उसे आत्महत्या तक पहुंचा दिया।

आयशा के मामले के बाद लोगों को गंभीर चिंतन करना चाहिए और शुरुआत ​ख़ुद से करते हुए दहेज के लेन-देन या नुमाइशी शादियों का बहिष्कार करने की पहल करनी चाहिए। मज़हबी उलेमा को भी इसके लिए अपना दायित्व निभाने की ​ज़रूरत है। वे शादी समारोह और उससे पहले होने वाली तैयारियों में इस तरह की शर्तें लागू करें कि लोग महंगी शादियों से बचने पर मजबूर हों। कोशिश यह भी होना चाहिए कि इस तरह का कोई हलफ़नामा भी निकाह रजिस्ट्रेशन के दौरान दोनों पक्षों से लिखवाया जाए कि, शादी के दौरान दहेज से लेकर फ़िज़ूल​ख़​र्ची तक कोई ​क़​वायद नहीं की जाएगी। असल सफाई ​ज़​हन की, दिमा​ग़​ और दिल की है, जिसके ​ज़​रिये ​ज़िंदगियों को सुंदर बनाया जा सकता है इसलिए कोशिश यह होनी चाहिए कि दहेज, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के खिलाफ मुस्लिम समाज ​सख़्त ​क़​दम उठाए और यह संदेश हर उस ​शख़्स तक पहुंचाया जाए जो महंगी शादियों और दहेज के ​मुख़ालिफ़ खड़े होने की नीयत तो रखता है, लेकिन ​ख़ुद को अकेला महसूस करता है।

मज़हब-ए-इस्लाम में ख़ुदकुशी हराम है मगर बहुत से मुसलमान ख़ुदकुशी कर रहे हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं का काम है कि वह मुसलमानों को जागरूक करें और उन्हें ​सख़्त से ​सख़्त हालात में भी सब्र का दामन हाथ से ना छोड़ने की शिक्षा दें। हालात बहुत ​ज़्यादा ​ख़​राब हैं। ऐसे में मुसलमानों को अपने भीतर के सुधार योग्य पहलुओं पर ​ग़ौर करने की ​ज़​रूरत है। अपनी ग़लतियों को अगर सुधारने की ​फ़ौरन कोशिश न की गई तो समाज टूट कर बिखरने लगेगा। यहां एक बात और काबिल-ए-​ग़ौर​ है कि सामाजिक कुरीतियों को हिंदू और मुस्लिम के नज़रिये से नहीं देखा जाना चाहिए। आज का समाज हद दर्जे का असभ्य और असंवेदनशील बन गया है। बेटियां समाज में सुरक्षित नहीं है। ‘यह तेरा ​ग़​म, यह मेरा ​ग़​म’ की नीति और नज़रिये से बाहर निकलना होगा। समाज का अधोपतन तो उसी दिन हो गया था जब कुरीतियों को धार्मिक आधार पर बांट दिया गया था। प्रेम, समर्पण, परिवार और इंसानियत के बजाय जब पैसा सब कुछ बन जाए तो आयशा जैसी बच्चियां उस दर्द को सह नहीं पातीं और टूटकर आत्महत्या जैसा ​क़​दम उठा लेती हैं। जब तक समाज अपना दृष्टिकोण नहीं बदलेगा तब तक इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी। सामाजिक कुरीति को मिटाने में अगर सरकारों की कोई दिलचस्पी न भी हो तब भी सामाजिक संगठनों को इस ज़िम्मेदारी को निभाना होगा। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ तभी सार्थक है जब बेटी गर्भ में न मारी जाए, वह शान से दुनिया में आए, उच्च शिक्षा प्राप्त करे, किसी नराधम की हवस का शिकार न हो। और हां, वह दहेज जैसी कुरीति के साथ ही किसी मानसिक, शारीरिक या किसी भी अन्य उत्पीड़न का शिकार होकर आत्महत्या करने पर मजबूर न हो।


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)