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भाजपा को मुसलमानों से शिकायत ! / सैयद सलमान
Friday, June 7, 2024 5:56:55 PM - By सैयद सलमान

तस्वीर साभार - सतीश आचार्य
साभार - दोपहर का सामना  07 06 2024

लोकसभा २०२४ के चुनावी नतीजे आ गए। तमाम सर्वेक्षणों को धता बताते हुए भाजपा के ४०० पार की कलई जागरूक मतदाताओं ने खोल दी। पूरा एनडीए कुनबा २९३ (भाजपा २४०) सीट पर सिमट गया। इंडिया गठबंधन ने कड़ी टक्कर दी और सफलतापूर्वक २३४ सीट पर जीत दर्ज की। अगर नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे लोगों ने शुरू में इंडिया गठबंधन के साथ आकर बाद में पलटी न मारी होती तो नतीजे कुछ और ही होते। भाजपा ख़ेमे को सबसे बड़ा झटका महाराष्ट्र और यूपी ने दिया जिसकी गूंज बहुत दिनों तक सुनी जाएगी। इन चुनावी नतीजों ने राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका के बारे में गहन बहस छेड़ दी है। भाजपा मुसलमानों को निशाना बना रही है कि सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने वाले मुसलमानों ने भी उसे वोट नहीं दिया। मुसलमानों के वोट की चाहत रखने वाले भाजपाइयों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी योजनाएं सरकार की होती हैं, किसी पार्टी की नहीं। वह आम नागरिक के टैक्स से चलती हैं। योजनाएं रिश्वत नहीं, जो बदले में ज़बरदस्ती वोट दिया जाए। जागरूक मतदाता उसी पार्टी को वोट देता है जो चहुंमुखी विकास की बात करती है, न कि घृणा की राजनीति को बढ़ावा देती है। जिस पार्टी का नेता प्रधानमंत्री बनने और दो कार्यकाल पूरा करने के बाद भी हिंदू-मुस्लिम, घुसपैठिया, ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाले, भैंस, मछली, मटन, मंगलसूत्र, मुजरा जैसी शब्दावली का उपयोग करे, आख़िर क्योंकर मुसलमान उसके नाम पर वोट करेगा? यही नहीं उसके समर्थक भी उसी भाषा का इस्तेमाल करें, तो मुसलमान क्यों न पहले अपनी सुरक्षा और मुख्यधारा की राजनीति को प्राथमिकता दे।  

शायद इसीलिए इस लोकसभा चुनाव में देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। झूठे वादों से लुभाने के तमाम प्रयासों के बावजूद, मुस्लिम समाज बड़े पैमाने पर भाजपा के बजाय इंडिया गठबंधन के प्रति वफ़ादार रहा। प्रधानमंत्री सहित भाजपा के कई नेताओं ने लगातार मुसलमानों को निशाना बनाया, जिससे समुदाय में भय और अविश्वास की भावना पैदा हुई। भाजपा से मुसलमानों की दूरी का प्रमुख कारक भाजपा की मुस्लिम विरोधी बयानबाज़ी रही। एक अन्य कारण मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान करने में भाजपा की विफलता रही। एनडीए गठबंधन भी मुस्लिम मतदाताओं के साथ महत्वपूर्ण पैठ बनाने में विफल रहा। गठबंधन के नेताओं पर विभाजनकारी बयान देने और मुसलमानों में भय को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया। इस से मुस्लिम विश्वास में और कमी आई। इसके विपरीत, कांग्रेस, शिवसेना- उद्धव बालासाहब ठाकरे, टीएमसी, राजद और एसपी जैसी अन्य पार्टियों ने मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास अर्जित किया। अपने मूल वोट आधार के लिए मुसलमानों को बदनाम करने और सामाजिक कल्याण योजनाओं और विकास के साथ मुस्लिम आबादी के कुछ वर्गों को लुभाने की भाजपा की दोहरी रणनीति की भी आलोचना हुई। पसमांदा मुसलमानों को लुभाने वाले इस दृष्टिकोण को मुस्लिम समुदाय को विभाजित करने और आंतरिक मतभेद पैदा करने की रणनीति के रूप में देखा गया। ऐसे में आख़िर मुसलमान भाजपा को क्यों वोट करे? 

अगर इंडिया गठबंधन से अलग करते हुए असदुद्दीन ओवैसी को भी जोड़ लिया जाए तो इस बार २६ मुस्लिम सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे हैं। मुसलमानों ने देश भर में उन पार्टियों से किनारा किया जो दिन रात उन्हें कोसते रहते हैं। जहां तक महाराष्ट्र की बात है, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना की महाराष्ट्र में मज़बूत उपस्थिति थी और मुस्लिम मतदाताओं द्वारा इसे एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखा गया। उसकी भाजपा के प्रति आक्रामक भूमिका भी मुसलमानों को पसंद आई। शिवसेना पक्षप्रमुख और मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में किसी प्रकार का भेदभाव मुसलमानों को नहीं नज़र आया था। हालांकि भाजपा और उसके समर्थित संगठनों ने हर संभव माहौल बिगड़ने की कोशिश की थी। उद्धव ठाकरे की शिवसेना का कांग्रेस और एनसीपी के साथ किया गठबंधन और इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनना भी स्थिति को और मज़बूत करने का कारण बना। जबकि भाजपा ने मुसलमानों के प्रति केवल नफ़रत भरी राजनीति को ही बढ़ावा दिया। मुसलमानों को कोसने से पहले भाजपा को चिंतन करना चाहिए कि श्रीराम मंदिर का शर्मनाक तरीक़े से श्रेय लेने के बावजूद श्रीराम की नगरी अयोध्या और श्रीराम के लिए महत्वपूर्ण चित्रकूट से भाजपा को हिंदुओं ने क्यों हराया। क्योंकि, श्रीराम सबके हैं और उनके असल भक्तों को नफ़रत नहीं मोहब्बत पसंद है। इसलिए भाजपा को मुसलमानों के सिर ठीकरा फोड़ने से बाज़ आना चाहिए और अयोध्या के साथ चित्रकूट की हार, मोदी की कम मार्जिन से मिली जीत, कई केंद्रीय मंत्रियों की अपमानजनक हार, पिछले दो बार के मुक़ाबले कम सीट पर जीतने और अपने दम पर बहुमत के आंकड़े से काफ़ी दूर रहने जैसे कई कारकों की समीक्षा करने की ज़रूरत है। 


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)