Monday, June 17, 2024

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झूठ और झांसे का उतरना चाहिए नक़ाब ​/ सैयद सलमान
Saturday, May 18, 2024 9:30:57 AM - By सैयद सलमान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘एम’ शब्द से बहुत प्यार है, इसलिए वो लगातार 'मुस्लिम, मटन और मंगलसूत्र' पर बातें करते रहते हैं
साभार- दोपहर का सामना 17 05 2024

लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण का चुनाव आगामी २० मई को होगा। मुंबई और आसपास के कई लोकसभा चुनाव क्षेत्रों में चुनाव उसी दिन होना है। पिछले चार चरण के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न तो अपने पिछले दस साल के कार्यकाल की किसी जनहितकारी उपलब्धि को लेकर वोट मांगा है, न ही आगामी किस योजना का ख़ाका जनता के सामने रखा है, जिसके आधार पर वोट मांगा जा सके। उन्होंने बस विभाजनकारी भाषणों के माध्यम से जनता में द्वेष को बढ़ाने का काम किया है। हालांकि जनता भी अब इतनी ढीठ हो चुकी है, कि ऐसे किसी भी झांसे में नहीं आती। सारा आईटी सेल और भाजपा के धुरंधर परेशान हैं कि आख़िर उनका पनपसंद सांप्रदायिक तनाव सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहा, जिस से वह उस आग की लपटों में अपनी सियासी रोटी सेंकी जा सके। हिंदू-मुसलमान के बीच वैमनस्य बढ़ाने के तमाम जतन नाकामयाब हो रहे हैं। आम नागरिक अब सवाल उठा रहा है। यह चुनाव सीधे-सीधे जनता बनाम भाजपा के बीच हो गया है। भाजपा इसीलिए बौखलाई हुई है। पिछले चार चरण के चुनाव में भाजपा को लाभ होता नहीं दिखा रहा है। प्रधानमंत्री लगातार मुसलमानों को टारगेट कर रहे हैं, लेकिन मामला कुछ जम नहीं रहा है। वह इस चुनाव को हिंदू बनाम मुसलमान करने पर आमादा हैं। उनके भाषणों से यह साफ़ झलकता है।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में मुसलमानों के लिए 'घुसपैठिए' और 'ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाला' जैसी बातें कहीं। इस संदर्भ में उन्होंने झूठा दावा करते हुए बहुसंख्यक वर्ग को बरगलाया। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के घोषणापत्र में माताओं-बहनों के सोने का हिसाब और जानकारी लेने और फिर उसे मुसलमानों को बांट देने का उल्लेख है, क्योंकि बकौल कांग्रेस देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसके लिए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक पुराने भाषण का हवाला दिया। नरेंद्र मोदी ने इसे शहरी नक्सलियों की सोच बताते हुए दावा किया कि इस से देश की माताओं-बहनों का मंगलसूत्र भी नहीं बचेगा। संपत्ति के भी टुकड़े कर मुसलमानों को दे दिया जाएगा। 'ज़्यादा बच्चे पैदा करने' और 'घुसपैठिए' वाले मोदी के बयान पर काफ़ी विवाद भी हुआ और चुनाव आयोग से उसकी शिकायत की गई। लेकिन जब एक निजी चैनल की कथित मुस्लिम महिला पत्रकार जो पत्रकार कम घोषित रूप से मोदी महिमा के लिए कुख्यात हैं, उन्हें इंटरव्यू देने की बात आई तो अपने समर्थकों में महामानव रूप ले चुके नरेंद्र मोदी की भाषा ही बदल गई। वह सिरे से अपने बयानों से मुकर गए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि, "मैं जिस दिन हिंदू मुसलमान करूंगा, उस दिन सार्वजनिक जीवन में रहने योग्य नहीं रहूंगा। मैं हिंदू मुसलमान नहीं करूंगा, ये मेरा संकल्प है।" सरे आम गजब का झूठ। लेकिन यह क्या, इस पलटे हुए बयान पर चर्चा चल ही रही थी, कि २४ घंटे के भीतर श्रीमान फिर पलट गए। इस बार मोदी ने कहा, "कांग्रेस की सोच है कि देश की सरकारें जितना बजट बनाती हैं, उसका १५ प्रतिशत सिर्फ़ अल्पसंख्यकों पर खर्च हो।" इस बार 'घुसपैठिए' और 'ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाला' के बाद 'वोट बैंक' कहकर मुसलमानों पर निशाना साधा गया। एक प्रधानमंत्री को क्या ऐसे बयानात देने चाहिए जो उनके पद और प्रतिष्ठा के हिसाब से न हों? फिर भी नरेंद्र मोदी ऐसा कर रहे हैं। और मज़े की बात अपनी बातों से पलट भी जाते हैं।

एक प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वह बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों के मुद्दे और ग़रीबों की आय घटने की वजह पर बात करेगा। वह शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और देश के विकास पर बात करेगा। लेकिन वह ऐसा करने के बजाय मुसलमानों के सहारे चुनाव को ध्रुवीकरण के खेल पर ले जाना चाहते हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की एक बात से तो सहमत हुआ जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘एम’ शब्द से बहुत प्यार है, इसलिए वो लगातार 'मुस्लिम, मटन और मंगलसूत्र' पर बातें करते रहते हैं। हालांकि जनता उनसे सवाल कर रही है कि वह अपने पुराने वादों पर क्यों चुप हैं? विदेशी बैंकों में जमा काला धन लेकर १५ लाख सबके खाते में दूंगा, हर साल दो करोड़ नौकरी दूंगा, किसानों की आमदनी दोगुनी करूंगा, अहमदाबाद से मुंबई तक बुलेट ट्रेन लाऊंगा जैसे झूठ बोले गए। कहां हैं ये सब? बस इसी तरह हर बार 'नई गिल्ली लाकर नया दांव' खेला जा रहा है। इस देश की बहुसंख्यक जनता पर गर्व है, जो अब जाग चुकी है और किसी भी तरह के सांप्रदायिक वैमनस्य वाले झांसे में नहीं आ रही है। मुसलमानों को भी निश्चिंत होकर ऐसी जागरूक जनता के साथ खड़े होना चाहिए और झूठों के चेहरों से नक़ाब उतारने में हाथ बंटाना चाहिए।


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)