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एक पत्र प्रधानमंत्री के नाम......... / लता सेठ
Wednesday, July 20, 2016 - 9:36:29 PM - By लता सेठ

एक पत्र प्रधानमंत्री के नाम......... / लता सेठ
लता सेठ का भावुक पत्र पीएम मोदी के नाम
माननीय प्रधान मंत्री जी
नमस्ते
मैं नहीं जानती कि मेरा यह पत्र या इस पत्र का सार भी आपके समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा अथवा नहीं, किन्तु मैं स्वयं को इस पत्र को लिखने से रोक नहीं पा रही हूँ।
मुझे अपना वक्तव्य आप तक पहुंचाने के लिए कोई भूमिका नहीं बांधनी है। महोदय, आप देश की उन्नति, प्रगति, स्वछता, कुशलता, कुशलता इत्यादि के लिए चहुंमुखी अग्रसर हो रहें हैं, परन्तु देश की संस्कृति व सभ्यता। कहाँ धूमिल होती जा रही हैं ये भावनाएं।
हर रोज़ एक नयी 'बलात्कार', अब तो 'सामूहिक बलात्कार' की घटनाएं - जैसे एक 'प्रतिष्ठा प्रतिरूप' है।
महोदय, हम मानवता, सभ्यता, संस्कृति का पाठ स्कूलो में नहीं पढ़ा सकते तो क्या कानून भी ऐसे घिनौने अपराधों के लिए नहीं बना सकते। इतने असक्षम और असभ्य हैं हम। कितनी "निर्भया" जन्म लेंगीं।
रोहतक में हुए इस घिनौने कृत में जो बेटी आहत हुई क्या वो देश की बेटी नहीं। अहमदनगर में जो मासूम ऐसे दरिंदों का शिकार हुई और अकाल मौत की नींद सुला दी गयी वो इस देश की संतान नहीं। अहमदाबाद में जो लड़की आहत हुई वो किसी माँ की कोख से नहीं जन्मी। जिस औरत को गाँव में निर्वस्त्र करने पर मजबूर किया वो हमारी माता या बहिन नहीं।
बस...
हर वर्ष हम निर्भया काण्ड की बरसी मनाते रहेंगे। तो भारत में सभी दिन ऐसे कुकर्मों की शिकार बेटियों की बरसी का दिन ही घोषित कर दीजिये। क्योंकि यहाँ तो हर दिन ऐसी घटनाएं (और शायद एक नहीं अनेक) हो रही हैं।
महोदय, कब तक मात्र कुछ दिनों के लिए मोमबत्तियां जलाने का नाटक होता रहेगा। राजनितिक दल अपनी अपनी सियासी रोटियां सेंकते रहेंगे।
कुछ तो करिये, कुछ तो कहिये।
भ्रूण ह्त्या हो, या दहेज़ का शिकार - भारत में सदैव नारी ही आहत।
जैसे ये बलात्कारी वहशी दरिंदे खुद की वासना को पूरा करने में इतने सक्षम हो जातें हैं, कहीं कोई ऐसा इंसान न जन्म ले ले जो ऐसे वहशी दरिंदो का नाश करने के सनक में पागलपन की हदें पार कर जाए।

यदि हमारी कानून व्यवस्था ऐसे आतंकवादियों को सज़ा देने में चूकती रहेगी, इनके केस अदालतों में सालों चलते रहेंगे तो कौन बेटी ऐसे देश में जन्म लेना चाहेगी।
हटाइये फिर भ्रूण हत्या से पाबंदी, ऐसे घिनौने कृत का शिकार होने से तो बेहतर है आज से कोख में पलने वाली हर बच्ची की हत्या कर दो। नारी जाति का वजूद मिटा दो। "बेटी बचाओ" का नारा ख़त्म कर दो। किस के लिए बचाएँ और क्यों बचाएँ - इन वहशत गर्दों के लिए बचाएँ, इन क्रूर मानसिकता वाले भेड़ियों के लिए बचाएँ। ताकि वे उसे नोचें, और बाद में चंद मुट्ठी भर लोग मोमबत्तियां जलाकर प्रदर्शन करें और उन मोमबत्तियों की लौ पर हमारे देश के राजनेता अपना वोट बैंक सुदृढ़ करने क लिए अपनी राजनितिक रोटियां करारी करें।
है, मेरे पास उपाय है। दीजिये मेरा साथ, करिये इन दरिंदों के लिए वो सज़ा मुकर्रर जिसकी कल्पना मात्र से ही रूह काँप उठे। सिर्फ वो सज़ा दीजिये जिसके लिए लम्बी लम्बी अदालतों के बेंच न बनाने पड़ें, सज़ा ऐसी जिसके लिए कोई अपील न कर सके। है मेरे जहन में वो सज़ा - जो यदि हमारा कानून बन जाए तो नहीं पनपेंगे ऐसे दरिंदे।
सभी राजनितिक दलों से अनुरोध है मेरा - इस मुद्दे पर तो एकमत हो जाएँ। बचा सकते हैं आप, बचा लो अपनी बेटियों को।
मेरे इस पत्र को पढ़ने के पश्चात शायद इसे किसी कूड़ेदान में फेंक दिया जायेगा, क्योंकि आपके लिए या आपके द्वारा संयोजित टीम के लोगों के लिए शायद ये प्रश्न, ये मुद्दा बहुत ही तुच्छ है। किन्तु प्रार्थना है जो भी इसे पढ़े, अगर उसकी अंतरात्मा ज़रा भी झकझोरे, आँखों में छिपी शर्म का पानी पलकों की कोर तक आकर अटक जाए तो, यदि मुझे मेरे सवालों का जवाब देना चाहें तो, संकोच मत करियेगा।
यदि आप जानना चाहते हैं कि मेरे मर्म में ऐसे कुकर्मियों के लिए कौन से सज़ा छिपी है तो मुझसे संपर्क करने में हिचकिए नहीं।
मुझे या मुझसे जुड़े मेरे परिवार को कोई गम नहीं होगा यदि इस कार्य के लिए मुझपर ही किसी दिन हमला कर ख़त्म कर दिया जाए या फिर तेज़ाब डाल कर जला दिया जाए।
अब आप इसे पढ़ चुके - इसे रद्दी की टोकरी में फेंकिए या फिर इंसानियत जो आपके चेहरे पर आवेश के भाव ला रही है उसे भड़कने दीजिये। या फिर मुझे सिरफिरी समझ हंसी का पात्र बनाकर - यह कहना चाहते हैं - 'ये चलीं हैं देश को सुधारने' ऐसे फिकरे कसने हैं तो जी भर कर कसिए।
फैसला आपका है।

लता


(लेखिका दिल्ली के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह की संपादक हैं)