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वोट बैंक न बनें- मुख्यधारा में आएं / सैयद सलमान
Friday, April 19, 2019 - 10:23:32 AM - By सैयद सलमान

वोट बैंक न बनें- मुख्यधारा में आएं / सैयद सलमान
सैयद सलमान
साभार- दोपहर का सामना 19 04 2019

जो भी हो लोकसभा का यह आम चुनाव अनेक विवादित नेताओं की अनर्गल बयानबाजी के लिए हमेशा याद किया जाएगा। पहली बार विवादित बयानों को लेकर आख़िर चुनाव आयोग तक को सख़्त होना पड़ा और उसने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा सुप्रीमो मायावती, भाजपा नेता मेनका गाँधी और समाजवादी पार्टी के नेता आज़म खान पर कार्रवाई करते हुए प्रचार से दूर रखने की हिदायत जारी की। योगी आदित्य नाथ पर ७२ घंटे और मायावती पर ४८ घंटे का बैन लगाया गया। चुनाव आयोग ने केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और समाजवादी पार्टी के नेता आज़म खान को भी चुनाव प्रचार से रोक दिया। मेनका गांधी को ४८ घंटे तक और और आज़म खान को ७२ घंटे के लिए चुनाव प्रचार से रोका गया। चुनाव आयोग के मुताबिक़, इन नेताओं ने प्रचार के दौरान आचार संहिता का उल्लंघन किया है।

अगर बात नेताओं के बिगड़े बोल की करें तो योगी ने अपने बयान में कहा था कि, 'कांग्रेस, एसपी, बीएसपी को अगर 'अली' पर विश्वास है तो हमें भी 'बजरंग बली' पर विश्वास है।' योगी ने बीएसपी प्रमुख मायावती के उस भाषण की तरफ इशारा करते हुए यह टिप्पणी की थी, जिसमें मायावती ने मुसलमानों से एसपी-बीएसपी गठबंधन को वोट देने की अपील की थी। मायावती ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में विवादित बयान देते हुए कहा था कि, 'भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम बिरादरी के सभी लोग अपना वोट महागठबंधन को दें।' योगी और माया का मामला तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया था। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग से इस बारे में सवाल किया था कि, इन नेताओं के हालिया बयानों को आपत्तिजनक मानने के बावजूद आयोग उन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा? आखिर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट में हुई फ़ज़ीहत के बाद कार्रवाई करनी पड़ी।

मेनका गांधी ने सुल्तानपुर में एक रैली के दौरान मुस्लिम मतदाताओं को कहा था कि, 'अगर उन्हें कम वोट मिले तो इसका असर होने वाले काम पर पड़ेगा।' दरअसल, मेनका गांधी ने मुस्लिम मतदाताओं से कहा था कि, वे आगामी लोकसभा चुनाव में उनके पक्ष में मतदान करें क्योंकि मुसलमानों को चुनाव के बाद उनकी ज़रूरत पड़ेगी। मेनका ने एक चुनावी सभा में कहा था कि वह लोगों के प्यार और सहयोग से जीतती हैं लेकिन अगर यह जीत मुसलमानों के बिना होगी तो उन्हें अच्छी नहीं लगेगी। बीजेपी नेता यहीं नहीं रुकीं बल्कि कहा कि, 'ऐसी जीत के बाद मुसलमानों से दिल खट्टा हो जाता है और फिर जब मुसलमान किसी काम के लिये आता है तो फिर मैं सोचती हूं कि, नहीं रहने ही दो क्या फ़र्क़ पड़ता है। आख़िर नौकरी भी तो एक सौदेबाज़ी ही होती है।' मुस्लिम समाज को लेकर यह एक प्रकार की धमकी थी या सौदा था कि, अगर काम कराना है तो 'एक हाथ दो और एक हाथ लो।'

आज़म खान तो ख़ैर सारी हदें ही पार कर गए। जयाप्रदा से अपनी पुरानी खुन्नस निकालने के चक्कर में आज़म पूरी तरह बहक गए। रामपुर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए आज़म खान ने कहा, 'जिसकों हम उंगली पकड़कर रामपुर लाए, आपने १० साल जिनसे अपना प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको १७ बरस लगे, मैं १७ दिन में पहचान गया कि इनका अंडरवियर ख़ाकी रंग का है।' किसी महिला को लेकर आजम की यह टिप्पणी सचमुच उद्वेलित करती है। कोई पुरुष आख़िर कैसे किसी महिला के अंतर्वस्त्रों को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी कर सकता है। यह राजनीति के गिरते स्तर की ओर इशारा है। भाजपा के एक नेता ने तो राहुल गाँधी को मां की गाली देकर अपनी भड़ास निकाली।

ये सब वर्तमान चुनाव प्रचार की एक बानगी है जहाँ शब्दों की, भाषा की, मर्यादाओं की हर बेड़ियाँ टूट रही हैं। राजनैतिक धरातल पर पहुँच चुकी है सोच, जहाँ चुनाव, चुनाव न होकर ज़ुबानी अखाड़ा बन गया है। और काफ़ी कुछ मुसलमानों को या तो अपने पाले में करने के लिए हो रहा है या फिर मुसलमानों को लेकर बनाई गई नकारात्मक छवि के जरिये ध्रुवीकरण का खेल खेला जा रहा है। ऐसा शायद इसलिए कि मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने से उनके वोट भी बढ़े होंगे और अब तक उनके मतों को भेड़ों की तरह हांकने वालों की यह कोशिश रहेगी कि मुस्लिम मतदाता उसके बंधुआ मज़दूर बने रहें। लेकिन अगर मुस्लिम मतों की अहमियत बढ़ी है, तो मुसलमानों के लिए यह भी जान लेना ज़रुरी है कि उनकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ी है। ग़ौर करें, चारों नेताओं के बयानों के नेपथ्य में मुसलमानों के मतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। या यूँ कहें कि सारा बखेड़ा ही मुस्लिम मतों को लेकर है तो ग़लत नहीं होगा। योगी आदित्यनाथ का बयान भले ही सख़्त हो, लेकिन मायावती को भी सीधे मुसलमानों के वोटों को अपनी जागीर समझकर मांगने की ज़रुरत नहीं थी। आखिर बीजेपी का भय दिखाकर ही तो मुसलमानों से गठबंधन के पक्ष में मतदान करने की अपील मायावती कर रही थीं। यानि मायावती का बयान एक तरह से उकसाने वाला बयान था और उनका विवादित बयान आग में घी का काम कर गया। योगी को जवाब देने का मौक़ा मिल गया। जिन-जिन दलों को ध्रुवीकरण की राजनीति रास आती है, उनके लिए यह मौका सुनहरा था और उसे अपने-अपने राजनैतिक लाभ-हानि के नज़रिये से मायावती या योगी के बयानों को लपकने में किसी ने देर नहीं की।

तकनीकी तौर पर मेनका का मुस्लिम मतदाताओं को धमकाना भी कहीं से जायज़ नहीं कहा जाएगा। मुसलमानों को अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनने की आज़ादी है, लेकिन उनके काम न करने की धमकी पर चुनाव आयोग का सख़्त होना भी सही है। लेकिन क्या मुसलमानों ने इस बात पर कभी ग़ौर किया कि मेनका ने यह बयान क्यों दिया? सांप्रदायिक भेदभाव को अगर किनारे रखकर ग़ौर करें तो लगेगा कि मेनका के बयान के पीछे का मक़सद था कि, आखिर क्यों किसी दल से इतना भेद कि उसके उम्मीदवार को केवल इसलिए ख़ारिज किया जाए कि वह फ़लां दल से ताल्लुक़ रखता है। इसी के साथ बात आज़म खान की। आज़म खान के बिगड़े बोल तो सारी मर्यादा पार कर गए। किसी महिला के लिए इतनी गिरी भाषा का उपयोग करना किसी को कैसे शोभा दे सकता है? वह भी तब, जब मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा आज़म खान को अपना सियासी रहनुमा समझता है। सियासी क़द बढ़ने से कुछ भी बयान देने की छूट नहीं मिल जाती बल्कि और भी विनम्र होने की ज़रूरत होती है। अगर आप फलदार दरख़्त हैं तो झुकना आपकी फ़ितरत होनी चाहिए। याद रखें, अकड़कर खड़े रहने में उखड़कर गिर जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है।

आज पूरे देश में मायावती, योगी और मेनका के बयानों से ज्यादा आज़म के बयान की गूंज है। वह इसलिए कि, एक तो वोटबैंक कहलाने वाले मुसलमानों के समाज का एक बड़ा नेता बेतुका बयान देता है वह भी एक महिला को लेकर, दूसरे आज़म के बयान से पूरे देश के मुसलमानों को शर्मिंदा किया जा सके। जिस धर्म में महिलाओं के सम्मान की ताक़ीद की गई हो उसका सियासी रहनुमा अगर महिलाओं के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बयान दे, तो मुसलमानों का शर्मिदा होना वाजिब है। मुसलमानों को इकठ्ठा होकर ऐसे बयानों की मुख़ालिफ़त करने की ज़रूरत है। योगी और मेनका से उनके दलों के प्रति दुर्भावना की वजह से मुसलमानों की अब तक अगर दूरी बनी हुई है तो मायावती या आज़म खान को भी यह हक़ नहीं कि वह मुसलमानों को ध्रुवीकरण के खेल का मोहरा बनाएं।

आज़म, मेनका, मायावती और योगी आदित्यनाथ ने अपने विवादित बयान यूं ही नहीं दिए। देश के अनेक क्षेत्रों के जातीय समीकरणों को साधने के लालच में आचार संहिता की सीमा को लांघा गया। मुस्लिम मतों को साधने के लिए अगर आज़म, मेनका और मायावती ने यह बयान दिया तो मायावती के बयान पर हमला करते हुए योगी ने हिन्दुत्व के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण के लिए यह बयान दिया। सियासी दलों के रणनीतिकारों का मानना है कि वर्तमान दौर में जब मूल मुद्दों से जनता का ध्यान भटक जाए तो सिर्फ़ ध्रुवीकरण के दम पर ही जीत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। और यही हो रहा है। इन विवादों के बीच मुसलमानों की भावनाएं, समस्याएं या मूल मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं। किसी को नहीं पड़ी है कि वह मुसलमानों की मूल समस्या पर बात करे। समझदारी इसी में है कि इन विवादों से मुस्लिम समाज बचे और वोट बैंक बनने के बजाय राष्ट्र की मुख्यधारा का हिस्सा बने।