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हिंदी दिवस विशेष : हिंदी के विकास के लिए घर पर हिंदी के संस्कार देने होंगे / दानिया फ़ातिमा
Saturday, September 14, 2019 - 12:59:41 PM - By दानिया फ़ातिमा

हिंदी दिवस विशेष : हिंदी के विकास के लिए घर पर हिंदी के संस्कार देने होंगे / दानिया फ़ातिमा
हिंदी से बढ़ती देश की शान, इससे ही होगा हमारा समान

हिंदी है तो हैं हम
बिन हिंदी हम क्या हैं
हिंदी से बढ़ती देश की शान
इससे ही होगा हमारा समान

'हिंदी दिवस....' यह वह दिन है जब हम सभी अपने राष्ट्रभाषा - हिंदी का प्रचार और प्रसार करते हैं। हिंदी विश्व भर में बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली जाने वाली मूल भाषा है। इस भाषा को भारत की मातृभाषा के रूप में घोषित किया गया है। १४ सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है ताकि हिंदी को भी हमारे देश की राष्ट्रभाषा होने का सौभाग्य प्राप्त हो। इसलिए, हिंदी दिवस विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ सरकारी क्षेत्रों में भी बड़े गर्व और उत्साह के साथ मनाया जाता है। समकालीन समय में जहां लोग अपनी जड़ों से भटक रहे हैं। हिंदी दिवस उनकी जड़ों से जुड़े रहने में मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को आयोजित किया गया था। 1975 से, भारत, मॉरीशस, यूनाइटेड किंगडम, त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विभिन्न देशों में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नागपुर में किया था। विश्व हिंदी दिवस, वैश्विक स्तर पर भाषा को बढ़ावा देने के लिए है, राष्ट्रीय स्तर पर देश भर में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय हिंदी दिवस, देवनागरी लिपि में आधिकारिक भाषा के रूप में लिखे गए हिंदी के रूपांतर है।

हिंदी अपने स्वर्णिम कालखंड के प्रवेश द्वार पर खड़ी है। इंटरनेट और सिनेमा जगत ने हिंदी को विश्वव्यापी बना दिया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बाजार में पैर जमाने के लिए अपने कर्मचारियों को हिंदी सिखा रही हैं। 70 करोड़ हिंदी भाषियों के साथ यह विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाला भाषा है। आज भारतीय संस्थानों के अतिरिक्त विश्व के 138 विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा का पठन-पाठन हो रहा है। कई देशों में हजारों विद्यार्थी हिंदी में शोध कार्य कर रहे हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि हिंदी वैश्विक भाषा बनती जा रही है।

मैकाले की शिक्षा पद्धति ने सबसे ज्यादा हिंदी को क्षति पहुंचाई। हिंदी के विकास के लिए हमें शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करना होगा। दूसरा, हिंदी को और विस्तार देने के लिए कुछ मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जैसे रुहेलखंड विश्वविद्यालय में आज तक हिंदी विभाग ही नहीं है। इस हालात में बदलाव के लिए सरकार को प्रयास करने होंगे।

हम घर पर हिंदी के संस्कार पैदा करें। दादी-नानी के साथ बच्चों को रखें। संस्कार वहीं से मिलेंगे। जब तक हम अपनी मां की सेवा नहीं करते तब तक दूसरे की मां की सेवा करना कोई परोपकार नहीं है। यह बात हमारी मातृभाषा हिंदी के लिए भी लागू होती है।

हिंदी की लोकप्रियता बढ़ रही है। इंटरनेट ने इसे वैश्विक बना दिया। विश्व भर के लोग हिंदी सिनेमा देखने, गीत समझने के लिए हिंदी भाषा सीख रहे हैं। सिनेमा में भी साहित्य है। यहां बड़े साहित्यकार हैं, जिन्होंने हिंदी की सेवा कर विस्तार किया है। ई-बुक, वेब मैगजीन का क्रेज बढ़ा है। आज हिंदी को केवल रोजगार से जोड़ने की जरूरत है। न्यायालय की भाषा में सरल हिंदी का प्रयोग हो। आज हर बच्चा डॉक्टर-इंजीनियर बनना चाहता है। मगर हिंदी में इनकी पुस्तकें नहीं हैं। यह भी एक कारण है कि बच्चे अंग्रेजी की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। अगर बच्चों को शुरुआत से ही हिंदी भाषा की तरफ आकर्षित किया जाए तो वे हिंदी में मजबूत होंगे। दूसरी भाषा भी जान लेंगे। हिंदी हर भारतीय के मन की भाषा है। शुरुआत में बच्चे हिंदी छोड़, विज्ञान, गणित को प्राथमिकता देते हैं। बाद में जब वह प्रतियोगी परीक्षा में जाते हैं, तब उन्हें हिंदी की आवश्यकता पड़ती। असफलता की चिंता से वे कोचिंग भी लेते हैं। शुरुआत में हिंदी को भी दूसरे विषयों की तरफ समय दें, तो यह समस्या नहीं आएगी।
हिंदी के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों की भूमिका अहम है। वे इसे और प्रभावी बना सकते हैं। आज इंटरनेट पर वेब पोर्टल, ई-पुस्तक लेखन का मंच मिलने से युवाओं में इसके प्रति रुचि बढ़ रही है। सिनेमा जगत में लोग हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही मूल रूप में नहीं जानते हैं। आज भी लोग सही हिंदी बोल नहीं पाते। खास बात यह कि बच्चों को गर्व से हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए। 
हिंदी के विकास के लिए व्यक्तिगत प्रयास करें। नकारात्मक चिंतन छोड़ें। आज भी लोग गुलामी की मानसिकता में जकड़े हैं, इसलिए बेहतर होती हिंदी को समझ नहीं पा रहे। हिंदी की दशा पहले से बहुत बेहतर हुई है। हिंदी सर्वसमावेषी भाषा है। इसने मुक्त मन से हर भाषा को स्वीकारा। हिंदी भाषा की विविधता ही इसकी विशेषता है। युग के अनुरूप सरलता भी आवश्यक है।