Tuesday, April 7, 2020

न्यूज़ अलर्ट
1) अपने ही बने अपनों की जान के दुश्मन.... 2) लॉकडाउन तोड़ने के लिए कहने वाला शख्स गिरफ्तार .... 3) कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीज को लेने आए कर्मचारी की बड़ी लापरवाही .... 4) भाजपा आमदार पराग अळवणी यांच्या प्रयत्नातून विले पार्ले मतादारसंघात परिसर निर्जंतुकीकरण कामास प्रारंभ.... 5) अगले 20 दिनों तक 5 करोड़ लोगों को भोजन उपलब्ध करवाएगी भाजपा .... 6) नगरसेवक जगदीश अन्ना का कोरोना संक्रमण के खिलाफ सराहनीय प्रयास .... 7) कोरोना वायरस का भविष्य तय करेगा भारत - विश्व स्वास्थ्य संगठन ....
ईंट भट्टे में बंधुआ मजदूरी कर बीता बचपन, अब डीयू में बीएससी इलेक्ट्रोनिक्स पढ़ रहें हैं राजेश कुमार
Sunday, September 15, 2019 - 5:36:39 PM - By साकिब अहमद

ईंट भट्टे में बंधुआ मजदूरी कर बीता बचपन, अब डीयू में बीएससी इलेक्ट्रोनिक्स पढ़ रहें हैं राजेश कुमार
सांकेतिक चित्र
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज से बीएससी इलेक्ट्रोनिक्स की पढ़ाई कर रहे राजेश कुमार जाटव उस वक्त महज नौ साल के थे जब उन्हें 2007 में एक गैर सरकारी संगठन ने राजस्थान के ईंट भट्टे से मुक्त कराया था. वह इस ईंट भट्टे में अपने परिवार के साथ बंधुआ मजदूरी करते थे. जाटव के परिवार में सात सदस्य थे और उसके पिता की आमदनी इतनी नहीं थी कि वह अपने पूरे परिवार का पेट पाल पाते. इसलिए उन्होंने जाटव समेत परिवार के अन्य सदस्यों को ईंट भट्टे के काम में लगा लिया था, जहां उन्हें 18-18 घंटे काम करना पड़ता था. इसके अलावा भट्टे के मालिक ने उन्हें शारीरिक तौर पर प्रताडित भी किया.
इस बीच साल 2007 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी के संगठन "बचपन बचाओ आंदोलन" को बच्चों से बंधुआ मजदूरी कराने की सूचना मिली जिसके बाद जाटव को जयपुर के निकट विराट नगर से मुक्त कराया गया.
जाटव ने ‘भाषा' को बताया कि ईंट भट्टे से मुक्त कराने के बाद उन्हें जयपुर स्थित संगठन के बाल आश्रम ले जाया गया जहां अनौपचारिक शिक्षा देने के बाद उनका दाखिला पांचवीं कक्षा में कराया गया. सत्यार्थी की पत्नी और संगठन की सह संस्थापक सुमेधा कैलाश ने बताया कि जाटव पढ़ाई में काफी होशियार था और विज्ञान में उसकी खास रूचि थी.

इस वजह से उसे कक्षा आठवीं और नौवीं में लगातार दो साल राजस्थान सरकार की ओर से विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने बताया कि जाटव को 10वीं कक्षा में 81 फीसदी और 12वीं कक्षा में 82 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे. अच्छे नम्बर लाने के लिए राजस्थान सरकार ने जाटव को दो बार लैपटॉप दिया. संगठन अब तक 2700 से ज्यादा छात्रों का पुनर्वास कर चुका है जो अलग अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. इनमें कुछ वकील बने हैं तो कई ने अन्य पेशा चुना है. अब तो कई मुक्त कराए गए बच्चे अच्छी नौकरियां या अपना कारोबार कर रहे हैं और उन्होंने अपने घर भी बसा लिए हैं.
इसी तरह की कहानी छत्तीसगढ के एक विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने वाले वीरेंद्र सिंह की है. उसने नौ साल की उम्र में उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर के गेराज में क्लीनर के तौर पर काम करना शुरू किया और 2006 में संगठन ने उसे मुक्त कराया. सिंह ने नौ साल की उम्र तक स्कूल की शक्ल तक नहीं देखी थी. सुमेधा ने बताया कि सिंह को मुक्त कराने के बाद उसके माता-पिता को समझाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी जिसके बाद वे सिंह को बाल आश्रम भेजने को तैयार हुए. इसके बाद कुछ वक्त तक उसे अनौपचारिक शिक्षा दी गई है और फिर चौथी कक्षा में दाखिला दिला दिया गया.

उन्होंने बताया कि सिंह पढ़ाई में काफी होनहार था और इसका नतीजा ही रहा कि उसने ओपी जिंदल विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री ली. सिंह ने बताया कि वह फिलहाल नौकरी की तलाश में है और उसकी एमटेक करने की तमन्ना है. जाटव बाल मजबूरी और मानव तस्करी की वजह शिक्षा और आर्थिक तंगी को मानते हैं.


वह कहते हैं, ‘‘ मेरे हिसाब से शिक्षा की कमी की वजह से माता-पिता अपने बच्चों को काम पर लगा देते हैं. भले ही इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक तंगी हो, लेकिन अगर माता-पिता को शिक्षा की अहमियत पता होगी तो वे बच्चों को काम पर लगाने के बजाय पढाएंगे.''

सिंह ने कहा कि बाल मजदूरी और बंधुआ मजदूरी रोकने के लिए सबसे अहम है कि शिक्षा का ज्यादा से ज्यादा प्रसार हो, जिससे लोगों में जागरूकता आए.