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आतंकी फ़ितरत का असर… अभावों से बेज़ार हुआ पाकिस्तान / सैयद सलमान
Friday, November 6, 2020 - 10:14:41 AM - By सैयद सलमान 

आतंकी फ़ितरत का असर… अभावों से बेज़ार हुआ पाकिस्तान / सैयद सलमान
पाकिस्तान का आतंक को समर्थन दिखाना यह साबित करता है कि वह भीतर से खोखला हो चुका है
साभार- दोपहर का सामना  06 11 2020 

पाकिस्तान भी ग़ज़ब का मुल्क है। पुराने लोग ठीक ही कहा करते थे कि जो देश सुई भी न बना सकता हो वह किस बुनियाद पर भारत को आँखें दिखाने की हिमाक़त करता है। जब-जब उसने औक़ात से बाहर जाकर भारत की और टेढ़ी आंख की है तब-तब उसकी औक़ात उसे बता दी गई है। लेकिन पाकिस्तान है कि सुधरने से रहा। हमेशा ही वह भारत को अस्थिर करने का प्रयास करता रहा है। हालांकि हमेशा वह हर बुरे कृत्य से ख़ुद को पाक-साफ़ बताता है और यहां होने वाली किसी भी घटना में ख़ुद के शामिल होने से इनकार कर देता है। लेकिन इस बार उसके बड़बोलापन ने उसकी असलियत बता दी है। इस बार पाकिस्तान ने आख़िररकार क़बूल लिया है कि जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में उसका हाथ था। इतना ही नहीं पाकिस्तानी मंत्री फ़वाद चौधरी ने अपने देश की संसद में इस हमले को बड़ी कामयाबी तक बता दिया। पिछले साल १४ फ़रवरी, २०१९ को कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के काफ़िले पर आतंकी हमला हुआ था, जिसमें सीआरपीएफ़ के ४० जवान शहीद हो गए थे। इस हमले में आतंकियों ने आईईडी से भरी एक कार का इस्तेमाल करते हुए सीआरपीएफ़ जवानों के काफ़िले से लड़ा दिया था। इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। 

एक बात तो तय है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बुरी हालत है और पाकिस्तान बड़े वित्तीय संकट से जूझ रहा है। उसकी जीडीपी में भारी गिरावट आ गई है। सरकार अपना क़र्ज़ उतारने में सक्षम नहीं हो पा रही है। पाकिस्तानी रुपया लगातार लुढ़कता जा रहा है और देश पर विदेशी क़र्ज़ लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान का आतंक को समर्थन दिखाना यह साबित करता है कि वह भीतर से खोखला हो चुका है लेकिन अपनी अवाम को बरग़लाकर किसी भी तरह अपना सर ऊंचा बनाए रखना चाहता है। पाकिस्तान पर ३० हज़ार अरब का क़र्ज़ है। हर साल इमरान को १९ अरब का लोन चुकाना पड़ता है जबकि सूद की शक्ल में महीने के ६ अरब रुपए का जुगाड़ भी करना पड़ता है। ऊपर से जनता का भारी दबाव। वादों की बारात लेकर सेना की मदद से सत्ता पर क़ाबिज़ हुए इमरान को नवाज़ और भुट्टो परिवार ने इन दिनों मुश्किल में डाल रखा है। उस पर धार्मिक नेताओं ने भी उनके ख़िलाफ़ कमर कस ली है। नतीजन इमरान सरकार के बड़बोले मंत्री ने जनता का ध्यान भटकाने के लिए पुलवामा की ज़िम्मेदारी लेकर यह साबित करने की कोशिश की है कि यह बहादुरी है। लेकिन मूर्खों की समझ में यह नहीं आया कि इस से पूरे विश्व में जो उनकी किरकिरी हुई है उसका पाकिस्तान के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा। 

कोरोना महामारी ने मरे हुए पाकिस्तान को और भी मार डाला है। पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था और उद्योग और व्यापार को इस हद तक नुक़सान पहुंचाया कि वह अभी तक अपने पैरों पर खड़ा होने में सक्षम नहीं है। उसके लिए एक निराशाजनक ख़बर यह भी है कि फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स ने पाकिस्तान का नाम ग्रे सूची में डालने का फ़ैसला किया है और इस से भी कठोर क़दम उठाने की मांग की है। वर्तमान में १६ देश एफएटीएफ़ की ग्रे सूची में हैं। एक ब्लैकलिस्ट भी है जिसमें ईरान और उत्तर कोरिया शामिल हैं। ग्रे सूची में शामिल देशों को विभिन्न वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से मिलने वाला ऋण भी रोका जा सकता है। पाकिस्तान को जून २०१८ में एफएटीएफ़ की ग्रे सूची में जोड़ा गया था और इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने और सुधरने के लिए अक्टूबर २०१९ तक का वक़्त दिया गया था, जिसे बाद में चार महीने बढ़ाया भी गया था। पाकिस्तान ने आश्वासन दिया था कि वह दी गई समय सीमा के भीतर आवश्यक क़ानून को लागू करने के लिए प्रभावी प्रणाली विकसित करेगा। फ़रवरी २०२० तक, पाकिस्तान ने २७ एफएटीएफ़ सिफ़ारिशों में से केवल १४ को लागू किया था। शेष १३ सिफ़ारिशों को पूरा करने के लिए उसे चार महीने का और समय दिया गया था। पाकिस्तान ने सफ़ाई दी थी कि २१ सिफ़ारिशों में से कुछ को लागू किया गया है, लेकिन उसे सात और सिफ़ारिशों पर काम करने का भी निर्देश दिया गया है। रोचक यह है कि जब फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स द्वारा पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डालने की जब बात आई तो सऊदी अरब और चीन जैसे उसके स्वाभाविक मित्र देशों ने भी उसका साथ नहीं दिया और पाकिस्तान का विरोध किया था।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की केवल आर्थिक स्थिति ख़राब है। वह भीतर से भी राजनैतिक रूप से भी खखला होता जा रहा है। पाकिस्तान की सत्तारूढ़ इमरान सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष भी सड़कों पर उतर आया है। विपक्षी पार्टियां दरअसल पाकिस्तान की राजनीति में सेना के हस्तक्षेप का विरोध कर रही हैं और जवाबदेही का एक नया क़ानून बनाने की मांग कर रही हैं। इसी के साथ इमरान पर इस्तीफ़ा देने का दबाव भी बनाया जा रहा है। माना जाता है कि पाकिस्तान में आम तौर पर सेना ही यह तय करती है कि देश की सत्ता किसके हाथ में होगी। अब विपक्षी गठबंधन इसी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहा है। यह जानना भी रोचक है कि पाकिस्तान में विपक्षी पार्टियां ऐसे समय में सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हो रही हैं जब पाकिस्तान के कुछ इलाक़ों में तालिबान के दोबारा मज़बूत होने की ख़बरें आ रही हैं। इमरान खान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के तौर पर दो साल पूरे कर लिए हैं, लेकिन देश में चुनौतियों का अंबार है। महंगाई, बेरोज़गारी और विदेशी क़र्ज़ इमरान के माथे पर बल ला रहे हैं। ऐसे में विपक्ष का हल्लाबोल उनके लिए मुसीबत बन गया है। क्या यही वजह नहीं है कि इमरान के मंत्री ख़ुद का गाल बजाते हुए पुलवामा की कायरतापूर्ण कार्रवाई को अपनी बहादुरी बताकर अपनी अवाम को गुमराह कर रहे हैं? 

जब पाकिस्तान की स्थापना की गई थी तब जिन्नाह ने ऐलान किया था कि भले ही पाकिस्तान की स्थापना धर्म के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा। तब अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा की अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा था कि, "अब आप अब आज़ाद हैं। आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए। आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका पाकिस्तान के राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है। अब हम सभी एक ही देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। ऐसे नागरिक, जो सभी एक-दूसरे के बराबर हैं।" इसी बात को उन्होंने फ़रवरी १९४८ में भी दोहराया था कि, किसी भी हालत में पाकिस्तान धार्मिक राज्य नहीं बनेगा। उन्होंने सभी हिंदू, ईसाई, पारसी और अन्य ग़ैर-मुस्लिमों को पाकिस्तानी बताया था। लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया। लेकिन यहां भी पाकिस्तान का विरोधाभास क़ायम रहा जब वहां मुसलमान शिया-सुन्नी, जमात-ए-इस्लामी-अहले हदीस और अन्य फ़िरक़ों में बंटकर आपस में ही एक दूसरे के ख़िलाफ़ हिंसा करने लगे। पाकिस्तान में तो मस्जिदों में, स्कूल में, दरगाहों पर भी बमबारी होती है। ख़ून का यह खेल पाकिस्तान के मुंह लग गया है। लेकिन धर्म की यह अफ़ीम उसके गले की फांस भी बन सकती है। भीतर से खोखला और बाहर से पूरी तरह मक्कार के रूप में उजागर पाकिस्तान कब अपने ही कर्मों से कब नेस्त-ओ-नाबूद हो जाए कहा नहीं जा सकता। आतंकवाद को जिहाद कहना, पड़ोसी मुल्क को कमज़ोर करने की साज़िश करना, अपनी अवाम को झूठ और नफ़रत की निरंतर ख़ुराक देना, बच्चों और नमाज़ियों तक को न बख़्शते हुए उनका सामूहिक ख़ून बहाना पाकिस्तान के नज़रिये से किस इस्लाम में जायज़ है यह तो वही जाने, लेकिन सही इस्लाम इन बातों की कभी इजाज़त नहीं देता। पुलवामा मामले की स्वीकारोक्ति उसके चेहरे पर पड़े नक़ाब को और स्पष्ट रूप से उजागर करती है। पाकिस्तान का भविष्य साफ़ अंधकारमय नज़र आ रहा है। सारे जग को यह पता है, काश इस्लाम के नाम पर ग़ैर-इस्लामी कृत्य करते पाकिस्तान को भी यह बात समझ में आ जाती। 


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग फैकेल्टी हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)