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मज़हब की क़ीमत
Thursday, November 5, 2015 - 10:04:20 AM - By घनश्याम अग्रवाल

मज़हब की क़ीमत
भूख से बड़ा है कोई धर्म ?
तीन दिन से नाले में दुबका वह बूढ़ा भिखारी, आज कर्फ्यू में कुछ छूट मिली तो पेट की आग बुझाने, सड़क पर हाथ फैलाए चिल्ला रहा था-" भगवान् के नाम पर मुझे चार आने दो, तीन दिन से भूखा हूँ। "

पर कुछ लोग जली हुई और लुटी हुई दुकानों का नज़ारा देखने में व्यस्त थे तो कुछ सामान खरीदने में।उसकी हथेलियों पर मात्र दो चवन्नियाँ ही थीं। दो-तीन चवन्नी और मिल जाएँ तो वह कुछ खा-पी लेगा।
यह सोचता हुआ वह आगे बढ़ता गया।

कर्फ्यू का समय हो रहा था।लोग तेजी से अपने- अपने घरों की ओर बढ़ने लगे।दुकानें बन्द होने लगी।
वह भी तेजी से अपने नाले की ओर बढ़ता गया।
जो कुछ भी इस आठ आने में मिलेगा, उसे ही खा लूँगा -यह सोचता हुआ वह खुली- अधखुली दुकानों को तलाशने लगा।

गली के नुक्कड़ पर तीन- चार आदमियों को देख, एक-दो चवन्नी की आशा में उसने अपनी हथेली फैलाते हुए कहा-" भगवान् के नाम पर चार आने दो,
तीन दिन का भूखा हूँ मैं।"

चारों ने इधर-उधर देखा। एक सन्नाटा-सा था। एक ने कहा-" भगवान् का नाम लेता है। हिन्दू है, मारो
साले को। "

" नहीं- नहीं, मैं हिन्दू नहीं हूँ। मुझे मत मारो।"
" हिन्दू नहीं है ? तो फिर मुसलमान होकर भगवान् का नाम लेता है। काफ़िर है ये ! मारो साले को ! " सब एक साथ चिल्लाए।
" नहीं- नहीं मैं मुसलमान नहीं हूँ। मुझे मत मारो।"
" तो फिर तू कौन है ? तेरा मज़हब क्या है ? "
" मैं तो एक भिखारी हूँ, बाबा ! मेरा क्या मज़हब ?

किसी ने भगवान् के नाम पर चार आने दिए तो हिन्दू हो जाता हूँ और किसी ने अल्लाह के नाम पर चार आने दिए तो मुसलमान हो जाता हूँ।"
मारनेवालों के हाथ हवा में ही ठहर गए।शायद इसीलिए कि वे समझ नहीं पाए कि यह हिन्दू है या मुसलमान; या फिर इसलिए कि जिस मज़हब के नाम पर वे इतना ख़ून-खराबा कर रहे हैं, उसकी क़ीमत सिर्फ चार आने है।