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शिक्षाक्षेत्र में बदलाव की बयार.... / विजय मिश्रा
Tuesday, March 12, 2019 - 12:04:50 PM - By विजय मिश्रा

शिक्षाक्षेत्र में बदलाव की बयार....  / विजय मिश्रा
विजय मिश्रा


शिक्षा के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी सुधार करने की जरूरत पर बल दिया जाने लगा है। स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों का पुनर्निरीक्षण करने की कवायद युद्धस्तर पर हो रही है। यह जरूरी भी था कि शिक्षा के उद्देश्यों को सामयिक रूप से परिभाषित कर पुनरीक्षित किया जाए। वैसे गुरुकुल से चला शिक्षा सफर अब इंटरनेशनल स्कूल की आलीशान बिल्डिंगों तक पहुँच गया है। शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है। इसीलिए शायद समूची दुनिया के सभी विकसित और विकासशील देशों में प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक दृष्टि से उच्च स्थान दिया जाता है। साथ ही ऐसी शिक्षा नीति बनाई जाती है जिसमें उनका मनोबल सदैव ऊँचा बना रहे। कुछ हद तक भारत में यह प्रयास तो हो रहा है लेकिन अभी भी कमियां हैं जिनपर काम किये जाने की जरुरत है।

भारत में प्राथमिक रूप से प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक या हाई स्कूल में स्कूल शिक्षा के चार चरण हैं। हालांकि, स्कूली शिक्षा के इन पहले १० वर्षों के भीतर संगठनात्मक पैटर्न के संदर्भ में विभिन्न राज्यों की अपनी अलग भूमिका होती है। सरकार ६ से १४ वर्ष की उम्र के सभी बच्चों के लिए प्राथमिक और उच्च प्राथमिक यानि सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत में, मुख्य प्रकार के स्कूल नियंत्रित करने के मुख्य तरीके हैं,

राज्य सरकार एसएसएलसी की तरह बोर्ड करती है, जिसमें भारतीय स्कूल-बच्चों के विशाल बहुमत नामांकित होते हैं,
केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) बोर्ड,
इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा परिषद (सीआईएससीई) बोर्ड,
नेशनल ओपन स्कूल और
“अंतर्राष्ट्रीय स्कूल।” ये स्कूल पश्चिम में स्कूलों को पैटर्न और पाठ्यक्रम में नकल करते हैं और नियमित स्कूलों की तुलना में काफी महंगा हैं। आयोजित परीक्षा में उपरोक्त उल्लिखित परिषदों या बोर्डों में से किसी का पाठ्यक्रम है।
कुल मिलाकर, एनयूईपीए (डीआईएसई, २००५-२००६) द्वारा किए गए नवीनतम सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार, ११,२४,०३३ स्कूल हैं।
प्रीस्कूल शैक्षिक सुविधाओं को प्राप्त करने वाले बच्चों के बहुत कम प्रतिशत के साथ भारत में प्राथमिक शिक्षा मौलिक अधिकार नहीं है। प्रावधान का सबसे बड़ा स्रोत तथाकथित एकीकृत बाल विकास सेवाएं (या आईसीडीएस) है, हालांकि, पूर्व में पूर्वस्कूली घटक कमजोर रहता है। महत्वपूर्ण सरकारी प्रावधानों की अनुपस्थिति में, समाज के अपेक्षाकृत समृद्ध वर्ग तक पहुंचने वाले निजी क्षेत्र के स्कूल खोले गए हैं। इन किंडरगार्टन में प्रावधान दो चरणों में बांटा गया है- निचला किंडरगार्टन (एलकेजी) और ऊपरी किंडरगार्टन। अक्सर बाल विहार नियमित स्कूलों का एक अभिन्न अंग है। हालांकि, समाज के वंचित वर्गों के लिए क्रीच और अन्य प्रारंभिक देखभाल सुविधाएं संख्या में बेहद सीमित हैं।

आठवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान, “सार्वभौमिकरण” प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य तीन व्यापक मानकों में विभाजित किया गया था: सार्वभौमिक पहुंच, सार्वभौमिक प्रतिधारण और सार्वभौमिक उपलब्धि यानि, बच्चों को शिक्षा सुलभ बनाना, यह सुनिश्चित करना कि वे शिक्षा जारी रखें और आखिरकार, लक्ष्यों को प्राप्त करना ।

भारत में उच्च शिक्षा एक शीर्ष निकाय द्वारा निगरानी की जाने वाली प्रत्येक धारा के साथ अलग-अलग और अलग-अलग धाराओं में विकसित हुई है, अप्रत्यक्ष रूप से मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा नियंत्रित। और राज्य सरकारों द्वारा वित्त पोषित। अधिकांश विश्वविद्यालयों को राज्यों द्वारा प्रशासित किया जाता है, हालांकि, केंद्रीय विश्वविद्यालयों नामक १८ महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय हैं, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा बनाए रखा जाता है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बढ़ी हुई धनराशि उन्हें राज्य के प्रतिस्पर्धियों पर लाभ प्रदान करती है।

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी को अत्यधिक सम्मानित किया जाता है, इसके कुछ छात्रों को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में रोड्स छात्रवृत्ति से सम्मानित किया जाता है, और ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को लगातार देश के शीर्ष चिकित्सा स्कूल में रेट किया जाता है। भारतीय स्कूल ऑफ बिजनेस, हैदराबाद और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) भारत में शीर्ष प्रबंधन संस्थान हैं।

भारतीय उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र मजबूत है। प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य में खर्च को बदलने के लिए सरकार द्वारा निर्णय के परिणामस्वरूप यह आंशिक रूप से आंशिक रूप से किया गया है।

शैक्षिक परिवर्तन के लिए शिक्षकों का मनोबल बनाए रखने और उत्साहपूर्वक कार्य करने की इच्छाशक्ति पैदा करने के लिए संगठित प्रयास करने की जरुरत है। एक और बड़ी समस्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्ता सुधारने और उनको निजी स्कूलों के साथ समान स्तर पर लाने की है जिससे अमीर और ग़रीब गाँव और देहात के बच्चों की पढ़ाई के स्तर का भेद ख़त्म हो। सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे। जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे। शिक्षा की समस्या का एक और पहलू है कि पढ़-लिख लेने के बाद कोई शारीरिक श्रम वाला काम नहीं करना चाहता और बाबूगीरी की नौकरियां इतनी हैं नहीं। इसलिए कई माँ-बाप सोचते हैं कि पढ़ने के बजाय बच्चा खेती मजदूरी का ही काम करे तो बेहतर है। इसलिए अब जरुरी हो गया है कि सोच को बदला जाए और शिक्षा को आधुनिक दर्जा दिया जाए।