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शरीयत, संविधान और सज़ा / सैयद सलमान
Friday, June 19, 2020 10:59:32 AM - By सैयद सलमान

सैयद सलमान
​साभार- दोपहर का सामना 19 06 2020

शरीयत, संविधान और सज़ा
बदला से बदलाव की ओर
कोड़े नहीं कारावास का क़ानून

इस्लामी जगत की एक ​ख़बर कोरोना की ​ख़​बरों के बीच दब गई। सजा देने के मामले में इस्लाम और शरीयत की ​सख़्ती से जुड़ी यह ​ख़​बर नरमपंथी मुसलमानों के लिए राहत भरी है। दरअसल सऊदी अरब में कोड़े मारे जाने की स​ज़ा​ को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया है। सऊदी अरब के ​क़ानून मंत्रालय के नए ​फ़​रमान के मुताबि​क़​ अब कोड़े मारने की स​ज़ा​ को बदल कर कारावास या जुर्माना या दोनों रूप में अमल में लाया जाएगा। सऊदी अरब के न्याय मंत्रालय ने इस संबंध में सऊदी अरब की सभी अदालतों को एक परिपत्र जारी कर निर्देश जारी कर दिए हैं। इसके बाद सऊदी अरब की अदालत को अब स​ज़ा​ के रूप में कोड़े लगाने के बजाय कारावास या जुर्माना या दोनों लगाना होगा। इस संबंध में, सुप्रीम कोर्ट के जनरल कमीशन ने भी क़ानून मंत्रालय के दिशा निर्देशों के आधार पर अदालतों के लिए एक ​फ़​रमान जारी कर दिया है। इसके पहले अदालतों को यह अधिकार था कि वे कई तरह के जुर्म के दोषी पाए जाने वालों को कोड़ों की स​ज़ा​ सुना सकते थे। इनमें विवाहेतर यौन संबंध और शांति को भंग करने से ले कर हत्या जैसे जुर्म शामिल हैं। भविष्य में जजों को जुर्माना, जेल की स​ज़ा​ या समाज सेवा जैसे विकल्पों में से किसी भी एक, दो या सभी विकल्प को चुनना होगा।

सऊदी अरब में कोड़े मारने की ​सज़ा की लंबे समय से मानवाधिकार संगठन निंदा करते आये हैं। हालांकि इन मानवाधिकार समूहों का यह भी कहना है कि प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की देख रेख में होने वाले ​क़ानूनी सुधारों की वजह से, देश में सरकार से असहमति के दमन में कोई कमी नहीं आई है। मौत की ​सज़ा अभी भी मौजूद है और उसका इस्तेमाल भी शासन के ​ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को शांत करने के लिए होता है। लेकिन फिर भी इस ​ख़बर को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ​सख़्त ​सज़ा​ देने के मामले में कुख्यात इस्लामी जगत के कथित मुखिया सऊदी अरब से यह पहल हुई है। अब तक यह धारणा बनी हुई थी कि शरीयत क़ानून में किसी तरह के रद्दो बदल की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन सऊदी अरब ने कोड़ों की ​सज़ा को हटाकर यह साबित करने की कोशिश की है कि शरीयत के मूल ढांचे के साथ छेड़-छड़ किये बिना क़ानून में बदलाव किया जा सकता है।

हर समाज और धर्म के भीतर लोगों के रहने के तौर-तरी​क़े​, नियम ​क़ायदे होते हैं। शरीयत इस्ला‍मिक समाज के भीतर रहने के उन्हीं नियमों का एक समूह है, जिससे पूरी दुनिया में इस्ला‍मिक समाज संचालित होता है। मुस्लिम समाज यह तो मानता है कि शरीयत अल्लाह का क़ानून है लेकिन उनमें इस बात को लेकर बहुत हद तक अंतर्विरोध और भ्रम है कि यह क़ानून कैसे परिभाषित और लागू होना चाहिए। अलग देशों, फ़िरक़ों​​, पंथों और संस्कृतियों में भी शरीयत को अलग-अलग ढंग से समझा जाता है। इस्लाम के अनुयायियों के लिए शरीयत क़ानून इस्लामी समाज में रहने के तौर-तरीक़ों, नियमों और ​क़ायदों के रूप में क़ानून की भूमिका निभाता है। पूरा इस्लामी समाज इसी शरीयत क़ानून के हिसाब से चलता है। लेकिन शरीयत क़ानून को केवल इस्लामी देशों में ही माना जाता है, ​ग़ैर-इस्लामी देशों में नहीं। जहां तक बात ​भारत की है, भारतीय​​ संविधान में सभी धर्मों, जातियों के लोगों को जीने के समान अधिकार दिए गए हैं लेकिन मुस्लिम समाज अपने शुद्ध घरेलू ​ख़ासकर शादी, तला​क़​, बच्चों से संबंधित मामलों, पति-पत्नी और माता-पिता के बीच के सभी मामलों का शरीयत क़ानून के हिसाब से ही समाधान निकालने पर ​ज़ोर देता है। इसके अलावा भारत​​ में मुस्लिम समाज के आपराधिक, नागरिक और दीवानी मामले भारतीय​​ संविधान के अंतर्गत ही देखे जाते हैं।

एक बात ग़ौर करने लायक है कि अनेक इस्लामिक देशों सहित ईसाई बहुल दक्षिण प्रांतों में भी अलग-अलग तौर से शरिया क़ानून काम करता है। नाईजीरिया में शरिया क़ानून के तहत संगसारी और कोड़े मारने जैसी सज़ाएं दी जाती रही हैं। सऊदी अरब जैसे शरिया को शुद्ध रूप से लागू करने के दावे करने वाले देशों में भी ऐसी ही सज़ाएं दी जाती हैं। लेकिन संगीन अपराधों के लिए सभी देशों में एक जैसी सज़ा नहीं दी जाती है। पाकिस्तान जैसे कुछ देश अपने आपको इस्लामी देश बताने के बावजूद अपराधियों को जेल या जुर्माना जैसी सज़ाएं देते हैं। मिस्र, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया जैसे देशों में भी संगीन अपराधों के लिए संगसारी, कोड़े बरसाना या हाथ काट देने जैसी सज़ाएं लागू नहीं हैं।

लेकिन पहले यह समझने की ज़रूरत है कि शरिया क़ानून है क्या। अरबी भाषा में शरीयत को इस्लामी धार्मिक कानून यानि शरिया क़ानून के नाम से जाना जाता है। शरीयत के अनुसार न्याय करने वाले पारंपरिक न्यायाधीशों को '​क़ाज़ी' कहा जाता है। कुछ जगहों पर 'इमाम' भी न्यायाधीशों का काम करते हैं लेकिन ​ज़्यादातर जगहों पर उनका काम केवल अध्ययन करना-कराना और धार्मिक प्रवचन देना ही होता है। शरिया क़ानून की परिभाषा के दो मूल स्रोत माने जाते हैं। पहला स्रोत है, इस्लामी धर्मग्रंथ पवित्र ​क़ुरआन और दूसरा ​पैग़ंबर मोहम्मद साहब द्वारा दी गई मिसालें जिन्हें सुन्नाह या सुन्नत कहा जाता है। इस्लामी मुल्कों में स्वास्थ्य, खानपान, पूजा विधि, व्रत विधि, विवाह, सामाजिक जुर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था जैसे अनेक विषय पर शरीयत का अमल अपनाया जाता है। ​क़ुरआन के मुताबि​क़​ शरिया ​क़ानून सि​र्फ़ एक क़ानून व्यवस्था ही नहीं है बल्कि पूरी जीवन शैली के लिए नियम निर्धारित करता है। शरिया क़ानून में आदमी की ज़िंदगी के बारीक से बारीक पहलुओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। जैसे, एक मुसलमान के कर्तव्य क्या हैं, उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में किस तरह से बर्ताव करना चाहिए और कारोबार और प्रशासन के तरीक़े कैसे हों इत्यादि। शादी के बिना या अपनी बीवी या शौहर के अलावा किसी और के साथ यौन संबंध रखना, बलात्कार, यौन दुराचार के बारे में किसी पर झूठे आरोप लगाना, शराब पीना, चोरी, राह​ज़​नी ​वग़ैरह भी शरई क़ानून की ​ज़​द में शामिल हैं। ऐसे अपराधों के लिए आमतौर पर संगसारी या पत्थर बरसाना, कोड़े मारना या हाथ काट देने का प्रावधान है। यौन अपराध करने वाले को संगसारी के ज़रिए मौत की सज़ा देने की व्यवस्था है, जबकि चोरी की सज़ा हाथ काट देना है। संगसारी में अपराधी को गर्दन तक ज़मीन में दबा दिया जाता है और फिर लोग उसके सिर पर तब तक पत्थर बरसाते हैं जब तक कि उसकी मौत नहीं हो जाती। शरिया क़ानून इस्लाम के भीतर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जीने के लिए ​क़ा​यदों की व्याख्या करता है। यह बताता है कि इन तमाम पहलुओं के बीच एक मुसलमान को कैसे जीवन का निर्वहन करना चाहिए।

इस्लामी नज़रिए के मुताबि​क़​ सुन्नी पंथ की चार प्रमुख संस्थाएं हन​फ़ी​, मालिकी, शा​फ़​ई और हंबली मानी जाती हैं। इसके अलावा इस्ना अशरी सबसे बड़ा शिया पंथ है। अन्य छोटे शिया पंथों में इस्माईली और ज़ैदिया​​ शामिल हैं। इन सभी की ​क़ुरआन की आयतों और इस्लामिक समाज के नियमों की अलग-अलग तरह से व्याख्या है। ये सभी संस्थाएं अलग-अलग सदियों में विकसित हुईं और बाद में मुस्लिम देशों ने अपने मुताबि​क़​ इन संस्थाओं के ​क़ानूनों को अपनाया। ऐसे में यह मान लेना कि सभी मूल रूप से पवित्र धर्मग्रंथ ​क़ुरआन के ही क़ानून को मानते हैं तो इसे विरोधाभास ही कहा जाएगा, क्योंकि अगर एक जैसी ही व्याख्या होती तो अलग-अलग पंथ, समूह और फ़िरक़े अलग-अलग क़ानून न मानते। ​क़ुरआन अगर अपरिवर्तनशील है तो उसके क़ानून भी अपरिवर्तनशील ही होने चाहिए। क़ुरआन में कोई तब्दीली न मुमकिन थी, न हो पाई, जबकि शरिया क़ानून में सहूलियत के अनुसार परिवर्तन होता रहा। अगर अब से पहले कोड़े मारना सही था तो अब कोड़े मारना ​ग़​लत कैसे हो सकता है। इसलिए इस्लामी स्कॉलर्स और मुस्लिम धर्मगुरुओं को इस विषय पर गहराई से अध्ययन करना चाहिए। अलग-अलग दौर में अलग-अलग मुस्लिम विद्वानों की ​क़ुरआन की अलग-अलग व्याख्या करने से इस्लाम से जुड़े कई विरोधाभास सामने आते हैं, जिसे लेकर एकमत होने की ​ज़​रूरत है। इस्लामी मान्यता है कि ​क़ुरआन का नु​ज़ूल भले ही पैग़ंबर​​ मोहम्मद साहब पर उनके दौर में लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व हुआ हुआ हो लेकिन उसकी शिक्षा हर दौर के लिए है। ऐसे में इस्लाम के सही नज़रिये को सामने रखते हुए ​क़ुरआन की सही सीख को सामने लाना चाहिए। इस्लामी हुकूमतें, मुस्लिम धर्मगुरु या इस्लामी संस्थाएं अपनी सहूलियत से क़ानून बनाने या बदलने के लिए अगर स्वतंत्र हैं तो उसे ​क़ुरआन की सीख या इस्लामी शरिया का नाम न दें, बल्कि उसे हुकूमत के क़ानून के रूप में पेश करें। बेहतर बदलाव का स्वागत भी किया जाना चाहिए। हां, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि उस बदलाव से ​क़ुरआन की 'सभी इंसान एक ही अल्लाह की ​मख़लूक़ हैं' की धारणा को नु​क़​सान न पहुंच रहा हो और यह बदलाव इंसानियत को क़ायम रखने के लिए किया जा रहा हो जो इस्लाम की रूह है।