Sunday, October 20, 2019

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मुसलमान पहचानें 'सच्चा हमदर्द !' / सैयद सलमान
Friday, October 4, 2019 9:59:51 AM - By सैयद सलमान

सैयद सलमान
साभार- दोपहर का सामना  27 09 2019


२१ सितम्बर को चुनावों की तारीख़ों का ऐलान होते ही आदर्श अचार संहिता लागू हो गई। हरियाणा के साथ ही महाराष्ट्र में २१ अक्टूबर को मतदान होगा, जबकि मतगणना २४ अक्टूबर को की जाएगी। आदर्श आचार संहिता के लगते ही अचानक से राजनैतिक गतिविधियां और बढ़ गई हैं। शिवसेना-बीजेपी के बीच की युति हो या कांग्रेस-एनसीपी के बीच का गठबंधन, सीटों का ऐलान अभी तक नहीं हुआ है। लेकिन माना जा रहा है कि सब कुछ तय हो चुका है, बस औपचारिक घोषणा होनी बाकी है। इस गहमागहमी के बीच मुसलमानों की क्या भूमिका होगी इस पर सभी की निगाहें लगी हैं। मुस्लिम समाज में भी इस पर मंथन किया जा रहा है। मुसलामानों का एक बड़ा तबक़ा अब वोटबैंक की राजनीति से तंग आकर बेधड़क शिवसेना और भाजपा के साथ जाने की वकालत कर रहा है। दूसरा तबका अभी तक कथित सेक्युलरिज़्म के नाम पर कांग्रेस-एनसीपी को छोड़ने को तैयार नहीं है। इस बीच समाजवादी पार्टी की कुछ इलाकों में अपनी पैठ कायम है लेकिन मुसलमानों की युवा पीढ़ी में अधिकांश का रुझान ओवैसी की एमआईएम की तरफ बढ़ा है। यही खींचतान आगे चलकर नतीजों को प्रभावित करेगी।

वर्ष २०१४ में हुए महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में ९ मुस्लिम विधायकों ने चुनाव जीता था। मोहम्मद आरिफ़ नसीम ख़ान (चांदिवली), असलम शेख़ (मालाड पश्चिम), शेख़ आसिफ़ शेख़ राशिद (मालेगांव सेंट्रल), अमीन पटेल (मुंबादेवी) और अब्दुल सत्तार अब्दुल नबी (सिल्लोड़) से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। समाजवादी पार्टी के अबू आसिम आज़मी (मानखुर्द-शिवाजी नगर) और एनसीपी के हसन मुश्रीफ़ (कागल) से विजयी रहे, जबकि सैयद इम्तियाज़ जलील (औरंगाबाद सेंट्रल) और एडवोकेट वारिस यूसुफ़ पठान (भायखला) से एमआईएम के टिकट पर चुनाव जीतकर चर्चा में आए। इन ९ में से ५ विधायक अकेले मुंबई से जीते, जिनमें तीन कांग्रेस के, एक समाजवादी पार्टी और एक एमआईएम से जीतकर विधानसभा में पहुंचे। महाराष्ट्र में अन्य तीन विधानसभा क्षेत्रों में एमआईएम के उम्मीदवार दूसरे क्रमांक पर रहे। कांग्रेस के विधायक अब्दुल सत्तार अब्दुल नबी ने शिबंधन बांधकर अब शिवसेना का दामन थाम लिया है। २००९ के चुनावों में, कांग्रेस के पांच मुस्लिम विधायक थे, समाजवादी पार्टी के तीन, एनसीपी के दो और जन सुराज शक्ति का एक मुस्लिम विधायक था। यानि मुस्लिम विधायकों की संख्या ११ थी। २०१९ में स्थिति अब तक साफ़ नहीं है। 

समाजवादी पार्टी को अपनी साख़ बचाने के लिए हर हाल में अपने प्रदेश अध्यक्ष और दो बार के विधायक अबू आसिम आज़मी की जीत सुनिश्चित करने की कोशिश करनी होगी वहीं एमएमआईएम भी अपनी दोनों सीटों को बचाते हुए अपनी संख्या बल बढ़ाना चाहेगी। सबसे ज़्यादा दबाव कांग्रेस-एनसीपी पर होगा क्योंकि यही दोनों पार्टियां मुसलमानों के वोट बैंक को साधने का काम करती रही हैं। जिन वोटों पर कभी कांग्रेस का एकाधिकार था उसमें सेंध लगाने का काम समाजवादी पार्टी और एमआईएम ने किया है। कांग्रेस के मुस्लिम विधायक अब्दुल सत्तार का शिवसेना में प्रवेश मुसलमानों के बदलते विचारों की तरफ इशारा करता है। कभी जिस शिवसेना से मुस्लिम समाज को परहेज था आज उस शिवसेना में मुसलमानों को न सिर्फ़ आदर के साथ शामिल किया जा रहा है बल्कि टिकट देने में भी कोई अड़चन नहीं है। २०१७ के मुंबई महानगरपालिका चुनाव में शिवसेना के दो नगरसेवक चुनकर भी आए। ‘हिन्दुत्व’ की विचारधारा के लिए पहचानी जाने वाली शिवसेना ने शहर के जिन दो मुस्लिम इलाकों में पैठ बनाई वहां से जीते उम्मीदवारों ने अपनी जीत के बाद भगवा पार्टी को मुस्लिम समाज का ‘सच्चा हमदर्द’ बताया था। बांद्रा (पूर्व) के बहरामपाड़ा और अंधेरी (पश्चिम) के अंबोली से ये नगरसेवक जीतकर आए थे। २०१२ में गठित महानगरपालिका में तो शिवसेना के मुख्य व्हिप का दारोमदार भी मुस्लिम नगरसेवक एडवोकेट मेराज शेख़ के ज़िम्मे था। रोचक तथ्य यह भी कि मेराज शेख़ चुनाव जीत कर नहीं बल्कि शिवसेना के को-ऑप्ट नगरसेवक थे। शिवसेना ने उन पर और टिकट देते समय अन्य मुस्लिम प्रत्याशियों पर विश्वास जताकर यह साबित कर दिया था कि उसे मुस्लिम समाज से परहेज नहीं है, बल्कि अगर योग्यता और निष्ठा है, तो वह ज़िम्मेदारियों भरा पद देने से भी गुरेज़ नहीं करेगी। 

अब तक मुस्लिम समाज की अशिक्षा और उनकी कम राजनैतिक समझ का अनेक दल लाभ उठाते रहे हैं। राज्य में मुस्लिम मतदाता हमेशा से शिवसेना-भाजपा गठबंधन के ख़िलाफ़ रहे। इस कारण मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस का मज़बूत आधार रहा। ग़ैर कांग्रेसी मुस्लिमों के लिए मुस्लिम लीग भी एक विकल्प थी जिसको मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने वाला दल माना जाने लगा था। लेकिन बाद के वर्षों में मुस्लिम लीग को यहां अधिक सफलता नहीं मिल सकी। १९९२ के बाबरी मस्जिद विध्वंस के चलते मुस्लिमों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। मुस्लिम लीग भी हाशिये पर चली गई। मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की महाराष्ट्र में तेजी से लोकप्रियता बढ़ी। जिसका कांग्रेस को काफ़ी नुकसान हुआ। हालांकि इस से पहले वोटबैंक की राजनीति के दम पर मुस्लिम समाज को अपने पाले में रखने में कथित सेक्युलर दलों को आशातीत सफलता मिलती रही है। लेकिन अब मुस्लिम समाज का शिक्षित होना राजनैतिक करवट का कारण बन रहा है। बदली परिस्थितियों में मुस्लिम समाज खुलकर अब राजनैतिक समझ का प्रदर्शन कर रहा है। अब वह कांग्रेस-एनसीपी के अलावा समाजवादी पार्टी और एमआईएम के साथ-साथ शिवसेना या बीजेपी को भी वोट देने से नहीं हिचकता। चुने हुए मुस्लिम प्रतिनिधि भी अब शिवबंधन बांधने से नहीं हिचकते। अमूमन ज़हर उगलने वाले चंद उर्दू अख़बार भी अब उनकी लानत-मलामत नहीं करते। क्योंकि, वह भी अब मानने लगे हैं कि मुस्लिम समाज की स्थिति के बिगड़ने का बड़ा कारण कूप-मंडूप बने रहना है। जब मुस्लिम समाज को यह समझ में आने लगा कि सेक्युलरिज़्म की चाशनी अब सियासी मधुमेह बनकर उनका नुकसान कर रही है, तो उनके भीतर से ही ख़ुराक और दवाइयां बदलने की आवाज़ उठने लगी। नतीजे सामने हैं। मुसलमान कब से छटपटा रहा था कि कोई तो उन पर विश्वास करे ताकि वह वह वोट बैंक के आरोपों से मुक्त हो। और जब यह विश्वास उन्हें मिलता हुआ प्रतीत हुआ तो उन्होंने खुले मन से शिवसेना और बीजेपी की न सिर्फ़ सदस्य्ता लेनी शुरू की बल्कि वोट देना भी शुरू किया। मुस्लिम समाज के इस बदलाव को कांग्रेस और एनसीपी भी महसूस कर रही है। उसके कई बड़े नेता 'डैमेज कंट्रोल' करने में लग गए हैं। बदली राजनैतिक परिस्थितियों में उन्हें कितनी सफलता मिलेगी, अभी कहा नहीं जा सकता। 

२०१९ के वर्तमान चुनाव में हर बार की तरह कांग्रेस-एनसीपी सहित अन्य मुस्लिम-परस्त दल ज़्यादा से ज़्यादा मुस्लिम उम्मीदवार जिताकर लाने के नाम पर मुस्लिम मतों की चाहत रखेंगे। इसके विरोध में मतों का ध्रुवीकरण होगा। मुस्लिम उम्मीदवारों की हार का ठीकरा उन दलों के मत्थे मढ़ा जाएगा जिसकी वजह से मुस्लिम उम्मीदवार हारे हैं। ऐसे में इस बात पर कौन विचार करेगा कि ऐसा क्यों हुआ? आख़िर क्यों मुस्लिम मतों का विभाजन हुआ? या क्या केवल मुस्लिम मत अमुक पार्टी को ही मिलने चाहिए? लोकतंत्र में भागीदारी का मतलब सिर्फ़ किसी समुदाय, वर्ग या धर्म को मिलने वाले ख़ास लाभ से नहीं होता है बल्कि यह उस समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक स्वीकार्यता को भी दर्शाता है। यह वक्त अब बहकावे की राजनीति से बाहर निकलकर व्यावहारिक राजनीति करने का है। मुसलमान अब इस बात को जितनी जल्दी समझ ले उतना बेहतर है।