Sunday, October 20, 2019

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…आख़िर काफ़िर हैं कौन......?
Friday, October 4, 2019 9:29:07 AM - By सैयद सलमान

सैयद सलमान
साभार- दोपहर का सामना  04 10 2019 

एक सामाजिक कार्यक्रम में अलग समूह बनाकर बैठे मित्रों के बीच बहस-मुबाहसे में 'काफ़िर' शब्द पर जमकर चर्चा हो रही थी। एक मुस्लिम साथी का कहना था कि जितने मुस्लिम हैं, उन्हें छोड़कर सभी धर्म के व्यक्ति काफ़िर हैं। जबकि दूसरे मुस्लिम मित्र उन्हें समझाने का प्रयास कर रहे थे कि ऐसा नहीं है, बल्कि पैग़म्बर मोहम्मद साहब किसी को भी धर्म के आधार पर काफ़िर कहने से मना करते थे। हिंदू भाई उनकी बातों को ग़ौर से सुनकर कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर काफ़िर है कौन? दरअसल यह बहस ऐसे जाहिलों के दिमाग़ की उपज है, जिन्हें न धर्म से कोई वास्ता है, न वे चाहते हैं कि सही इस्लाम को समझा जाए और लोगों को समझाया जाए। क़ुरआन को ठीक तरह से न समझना इसकी सबसे बड़ी वजह है। ऐसे लोगों के कारण ही आज दूसरे धर्मों के अनुयायियों के साथ मुस्लिम समाज की पैदा की गई ग़लतफ़हमियों ने खाई बढ़ाने का काम किया है और उसका ख़ामियाज़ा मुस्लिम समाज के उन लोगों को भी उठाना पड़ता है जिनका इस तरह के विवाद से कोई वास्ता नहीं है। मुस्लिम समाज के अन्य धर्मावलंबियों के साथ कई मतभेद हैं। उनमें सबसे अहम मतभेद में से यह शब्द भी है जिसे 'काफ़िर' कहते हैं। 

सबसे पहले तो यह जान लेना ज़रूरी है कि 'काफ़िर' शब्द 'कुफ़्र' से बना है, जिसका अर्थ है, छिपाने वाला, अकृतज्ञ (नाशुक्रा) और इनकार करने वाला। अल्लाह/ईश्वर के अस्तित्व और उसके बताए गए रास्ते पर न चलना उससे बग़ावत करने के सामान है, अर्थात 'काफ़िर' उसे कहते हैं जो ईश्वर को पहचान कर भी अपने अहम् या दुष्टों की बातों में आकर या किसी और कारणवश उसके होने का या उसके किसी आदेश का इनकार करे। पिछले करीब १४०० सालों से काफ़िर शब्द हमेशा विवाद और झगड़े का केंद्र रहा है। ख़ासतौर से भारत में यह समझा जाता है कि जो हिंदू या किसी अन्य धर्म को मानने वाला है, वह निश्चित रूप से काफ़िर है अथवा जो मुस्लिम नहीं है, उसका नाम काफ़िर है। वास्तव में ऐसा नहीं है। अगर कोई ऐसा समझता है तो वह ग़लत है। कई मुसलमान भी इस ग़लतफ़हमी के शिकार हैं कि जो उनके धर्म को नहीं मानता, वह काफ़िर है। इस ग़लतफ़हमी के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है हिंदू भाइयों द्वारा बिना किसी खोजबीन के जाहिल और कट्टरपंथी मुसलमानों के बयानों के आधार यह मान लेना कि इस्लाम की नज़र में वे काफ़िर हैं। वहीं दुनिया भर के मुसलमानों ने भी ग़ैर-मुस्लिम भाइयों को यह बताने की ज़रुरत ही नहीं महसूस की कि, जो मुस्लिम नहीं है, वह भी हमारा भाई है। किसी-किसी मुसलमान बुद्धिजीवी या इस्लाम के सच्चे पैरोकार आलिमों ने अगर बताया भी तो उनकी आवाज़ नहीं सुनी गई। 

अगर काफ़िर शब्द को सही-सही समझना है तो न केवल क़ुरआन की कुछ बुनियादी बातों को समझना होगा, बल्कि पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब और उनके ज़माने की परिस्थितियों को भी समझना होगा। जब नबी पर क़ुरआन नाज़िल होनी शुरू हुई तब अरब में घोर अंधकार, अराजकता और अज्ञानता का युग था। उस दौर में पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने लोगों को इबादत का सही तरीक़ा सिखाया और उन्हें समझाया कि देखो, यूं झगड़ा-फ़साद करते न फिरो, बल्कि भाई-भाई की तरह रहो, पढ़ने-लिखना सीखो, ज्ञान हासिल करो, जुए-शराब से दूर रहो, बेटियों को क़त्ल न करो, साफ़-सुथरे रहा करो। मोहम्मद साहब ने लोगों को यह तक सिखाया कि जूता पहनो तो कैसे पहनो, खाना खाओ तो कैसे बैठो, कितना खाओ, मेहमान बनो तो कैसे बनो, कारोबार करो तो कैसे करो, सौदा करो तो कैसे करो, किसी के बीच में न बोलो। यह बताया कि माल तोलो तो पूरा तोलो और कालाबाज़ारी कभी न करो। यह भी बताया कि मां-बाप से कैसा सलूक करो। उन्होंने यह तक बताया कि औरत के क्या अधिकार हैं। उन्होंने सामाजिक मतभेद मिटाते हुए बताया कि काले-गोरे में सिर्फ़ चमड़ी का भेद हैं, न कोई ऊंचा और न नीचा। यह समझाया कि किसी अरबी को ग़ैर-अरबी पर कोई बड़ाई नहीं है। पैग़म्बर मोहम्मद साहब की इन शिक्षाओं के बावजूद मूर्खता का वातावरण ऐसा था कि बजाय उनकी बातों को मानने के, कुछ लोग उन्हीं के दुश्मन हो गए और ऐसी तमाम अच्छाइयां बयान करने के बाद मोहम्मद साहब से लोगों ने कैसा सलूक किया? उन्हें इस क़दर परेशान किया कि उन्हें अपना मादरे वतन मक्का शरीफ़ छोड़ना पड़ा और मदीना शरीफ़ में शरण लेनी पड़ी। उन्होंने लोगों को सही राह पर चलने की बात कही तो लोगों को नागवार गुजरी। वे तो अपनी पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों को जारी रखने के हिमायती थे। उन्होंने पैग़म्बर मोहम्मद साहब से दुश्मनी का ऐलान किया, उन्हें बेघर कर दिया। इतने से भी मन न भरा तो फ़ौज लेकर आ गए, जंग लड़ी। यानि वे लोग मोहम्मद साहब की हर बात से इनकार करते रहे। उन लोगों ने रब से इनकार किया, मोहम्मद साहब के पैग़म्बर होने से इनकार किया, भलाई का बदला बुराई से दिया। 

इस्लाम में जहां कहीं काफ़िर शब्द आया है, वह ऐसे ही लोगों के लिए है। अपनी बुराइयों पर अकड़ दिखाने वाले यही लोग लोग काफ़िर थे, क्योंकि वे कुफ़्र करते रहे, ख़ुदा से इनकार करते रहे। न रब को मानने को तैयार हुए, न मोहम्मद साहब की शिक्षा को। यही इनकार करने वाले दरअसल सही मायने में काफ़िर हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, भारत का ग़ैर-मुस्लिम क्या काफ़िर हो सकता है? भारत के हिंदू भाइयों ने हज़रत मुहम्मद साहब को कोई तकलीफ़ नहीं दी। उन्होंने नबी पर कोई हमला नहीं किया। मोहम्मद साहब को कभी परेशान नहीं किया न उन पर ज़ुल्म किया। इतिहासकार मानते हैं कि, बेशक अरब या दुनिया के दूसरे हिस्सों में अज्ञान का अंधकार रहा हो लेकिन भारत में तब भी ज्ञान का प्रकाश था। इस्लाम और पवित्र क़ुरआन अपनी रक्षा के लिए उन काफ़िरों के ख़िलाफ़ युद्ध करने की बात कहता है, जिन्होंने नबी पर हमला किया था। साथ ही क़ुरआन, उन्हें अक़्ल आने पर उनके प्रति नरमी बरतने की बात भी कहता है। क़ुरआन उन हिंदुओं को मारने-काटने का संदेश कैसे दे सकता है जो अरब से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पर भारत में रह रहे हैं? तो फिर भला कोई भारतीय ग़ैर-मुस्लिम काफ़िर कैसे कहलाएगा? 

एक बात और, जिन काफ़िरों ने मोहम्मद साहब को सताया उनमें से बड़ी संख्या में लोग बाद में सुधर गए। उन्हें अपनी करनी पर पछतावा हुआ। बहुत थोड़े लोग थे जो युद्ध में उतरे, लेकिन ज़्यादातर को मोहम्मद साहब ने माफ़ भी कर दिया। क्या वो ज़माना अब है? उस दौर के लोग क़ब्रों में कब का दफ़्न होकर मिट्टी में मिल गए। फिर काफ़िर शब्द को लेकर यह विवाद क्यों? अच्छी बातों से इनकार करने वाले जो काफ़िर थे, वे मर गए, सुधर गए या ख़ाक में समा गए। उन काफ़िरों के ख़िलाफ़ उतरी आयतों को आज के दौर में ख़ुद पर लेना या दूसरों पर थोपना कहाँ की समझदारी है। इस्लाम इसकी इजाज़त नहीं देता। समझदारी इसी में है कि अब मुस्लिम-ग़ैर-मुस्लिम, एक-दूसरे को शक की निगहों से देखना और नफ़रत करना बंद करें। इस तरह की बातों से पहले ही सब अपना बहुत नुकसान कर चुके हैं। अब और नुकसान न होने पाए, इसका प्रयत्न किया जाना चाहिए। नैतिक बात यह है कि हर बुरी चीज़ का इनकार करना चाहिए और हर वह बात जो हमारा मार्गदर्शन करे उसे मानना चाहिए। जैसे क़ुरआन ने कहा कि 'तुम शैतान के काफ़िर हो जाओ और ईश्वर के आस्तिक बन जाओ।' काफ़िर शब्द की परिभाषा का सही संदर्भ में प्रयोग हो, न कि वैमनस्य या गाली के रूप में, इस बात का ख़्याल मुस्लिम समाज को अधिक रखना होगा।