Monday, August 26, 2019

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फ़िल्म समीक्षा: मुश्किल
Friday, August 9, 2019 9:18:00 PM - By फ़िल्म डेस्क

मुश्किल फ़िल्म
इस फिल्म की कहानी चार लड़कियों की है, जो ग्रीस घूमने जाती है और वहां वहां वो जिस बंगले में ठहरती है, वो प्रेत आत्मा के साये में है, जो इन्हें परेशान करता है, और उस प्रेत आत्मा से निजाद दिलाने के लिए बनारस से एक पढ़ा लिखा तांत्रिक आता है, रजनीश दुग्गल जो आत्मा को मुक्ति दिलाता है, फ़िल्म की कहानी में कुछ नया नही है, फिर भी हॉरर फिल्म के लिए ठीक ठाक कही जा सकती है, परंतु कहानी से ज़्यादा जिस बात की अहमियत होती है, जो फ़िल्म को अलग बनाता है, वो होता है, स्क्रीनप्ले...जो नासमझी में लिखा गया है, डायलॉग को आधुनिक युग का बनाने के लिए सोशल मीडिया की इतनी बात की गई है कि बर्दाश्त नही हो पाती, लेखन का कम अनुभव झलकता है, और फ़िल्म के लिए चूक लगता है।
राजीव रुईया ने पहले भी कई फिल्मों का निर्देशन किया है, लेकिन स्क्रीनप्ले क्या होता है, यह समझने में गच्चा खा गए। निर्देशन बुरा नही है, लेकिन फ़िल्म के सिन को रोमांचक बनाने के लिए सिन में ट्रीटमेंट की ज़रूरत होती है, जो नही किया गया। हॉरर फिल्म देखने वाले दर्शक इस उम्मीद से थियेटर जाते है कि फ़िल्म में कुछ हॉट सिन देखने को मिलेगा, लेकिन वहां भी गलती हो गयी।
हॉरर फिल्म थी, तीन गाने है, और ताज्जुब की बात है तीनो गाने बेहतरीन है, जैसा कि बड़े स्टार्स की फिल्मों में होते है, फ़िल्म के गाने हिट भी हुए, वरदान सिंह के दो रोमांटिक गीत है, रवि चोपड़ा का एक कंपोजिशन है, संगीत इस फ़िल्म का प्लस पॉइंट है।
छायांकन 90 के दशक का है, कहीं कहीं लाइट की कमी और ब्लर लेंस साफ झलकता है।

रजनीश दुग्गल, कुनाल रॉय कपूर से जो कराया गया, ईमानदारी से उन्होंने अपना योगदान दिया है, पूजा बिष्ट, नाज़िया हुसैन,शफ़क़ नाज़ और अर्चना शास्त्री फ़िल्म की खास किरदार है, लेकिन उनका ग्लैमर पर्दे पर नज़र नही आया, एक्टिंग का अनुभव ना होना अखरता है।
प्रोडक्शन वैल्यू ज़बरदस्त है, ग्रीस का शानदार और लुभावना लोकेशन, आंखों को अच्छा लगता है, लेकिन फ़िल्म इनडोर में हो घूमती है, कलाकारों को बेहतरीन कॉस्ट्यूम दिए गए, कोशिश की गई है कि फ़िल्म में प्रोडक्शन वैल्यू दिखे और दिखती भी है, निर्माता ने पैसे तो ख़र्च किये है, लेकिन वो ख़र्च उभर कर नही आ सका।
फ़िल्म को जो पब्लिसिटी मिलनी चाहिए थी, वो बिल्कुल नही मिली, जो फ़िल्म के लिए नुकसानदायक है। इस फ़िल्म के साथ "ज़बरिया जोड़ी" भी रिलीज हुई है, जिससे काफी उम्मीद थी, और जिसकी वजह से "मुश्किल" को थियेटर मिलने में मुश्किल हो गयी।
1964 का इतिहास फिर सामने आ गया, जब शशधर मुखर्जी की फ़िल्म "अप्रेल फूल" और किशोर कुमार की फ़िल्म "दूर गगन की छांव में" एक दिन ही रिलीज थी, शशधर ने सारे थियेटर बुक कर लिए थे ये सोच कर की उनकी फिल्म सुपरहिट है, बडी मुश्किल से किशोर कुमार को जीजा होने के नाते शशधर ने, दो थियेटर दान समझ कर दे दिया था, और पता चला कि शशधर की फ़िल्म पहले दिन ही औंधे मुंह गिरी, जिसका फायदा किशोर कुमार की फ़िल्म को मिला और मुम्बई के रॉयल थियेटर में उनकी फिल्म 25 हफ्ते चली, जबकि किशोर की फ़िल्म बाकी शहरों में नही चली, और मुम्बई से ही किशोर कुमार अपनी फिल्म में लगा पैसा निकालने में कामयाब हो गए।
ज़बरिया जोड़ी का भी वही हाल हुआ, बॉक्स ऑफिस पर नकार दी गयी है, जिसका फायदा मुश्किल को मिल सकता है, अगर प्रोड्यूसर छोटे सेंटर पर थियेटर हासिल करने में कामयाब हो जाते है।
कुल मिला कर "मुश्किल" एक बेहतरीन फ़िल्म तो नही, फिर भी टाइम पास करने के लिए एक बार देखी जा सकती है।