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अपने पैरों पर खड़ा होना होगा / सैयद सलमान
Friday, May 10, 2019 10:48:30 AM - By सैयद सलमान

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साभार- दोपहर का सामना 10 05 2019

चुनावी आपाधापी और प्रचार के शोर के बीच इस सप्ताह मुसलमानों का पवित्र महीना रमज़ान शुरू हो गया। मुसलमानों के लिहाज़ से यह सबसे पाक और मुक़द्दस महीना माना जाता है। तीस दिन के रोज़े (उपवास) के साथ ही दान-पुण्य के कारण इस माह की विशेषता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए पांच मूलभूत सिद्धांत हैं जिन्हें फ़र्ज़ की श्रेणी में रखा गया है। हर मुसलामन इन सिद्धांतों के अनुसार न सिर्फ़ अपना जीवन व्यतीत करता है बल्कि यह भी मानता है कि ऐसा न करके वह गुनहगार भी होगा। माना जाता है कि इन्हीं सिद्धांतों पर ईमान लाकर ही उसे इस्लाम का सच्चा अनुयायी कहलाने का हक़ होता है। यह पांच फ़र्ज़ हैं;
१) शहादत- यह इस्लाम धर्म का सबसे प्रमुख सिद्धांत है। हर मुसलमान को कलमा पढ़कर यह शहादा देना बेहद जरूरी है कि ईश्वर एक है और पैग़ंबर मोहम्मद साहब ईश्वर के रसूल (दूत) हैं।
२) सलात या नमाज़- किसी भी मुसलमान का दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ना फर्ज है। नमाज़ के बिना इस्लाम धर्म की संकल्पना ही अधूरी है। यह मुस्लिम जीवन का बेहद अहम हिस्सा माना जाता है।
३) रोज़ा (व्रत/उपवास)- इस्लामिक हिजरी कैलेंडर के हिसाब से नौवां महीना रमज़ान का होता है। रमज़ान के पूरे महीने में मुसलमान रोज़ा रखते हैं। इस्लामी मान्यतानुसार पवित्र क़ुरआन इसी महीने में उतारा गया था।
४) ज़कात- इस्लाम धर्म की मान्यतानुसार हर मुसलमान को अपनी वार्षिक कमाई का २.५ % ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को ज़कात के रूप में दान करना अनिवार्य है।
५) हज- यह इस्लाम का पांचवां और आख़िरी फ़र्ज़ है। हर साहिब-ए-हैसियत मुसलमान को ज़िंदगी में एक बार हज ज़रूर करना चाहिए।

रमज़ान महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग एक महीने रोज़े रखते हैं। इन दौरान सूर्योदय से भी पहले और सूर्यास्त तक न ही कुछ खाया जाता है और न ही कुछ पिया जाता है। रोज़े का मतलब बस अल्लाह के नाम पर भूखे-प्यासे रहना ही नहीं है। इस दौरान आंख, कान और ज़ुबान का भी रोज़ा रखा जाता है। इस बात का मतलब यह है कि न ही इस दौरान कुछ बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा बोलें। यानि वह अपने जिस्म के किसी भी हिस्से से कोई ग़लत काम ना करें। रमज़ान के महीने में रोज़ा रखने के पीछे तर्क दिया जाता है कि, इस दौरान व्यक्ति अपनी बुरी आदतों से दूर रहने के साथ-साथ ख़ुद पर भी संयम रखता है। दिन में कुछ भी नहीं खाया जाता जिस से भूख का महत्व समझ में आता है और गरीबी क्या होती है इसका एहसास होता है। भूख का ज्ञान होने पर फ़ाक़ाकशी करने वालों के प्रति सहानुभूति जागती है और इंसानियत का यही भाव मुसलमानों को नर्मदिल बनाता है। रोज़े के दौरान झूठ बोलना, पीठ पीछे किसी की बुराई करना, झूठी कसम खाना, लालच करना या कोई भी ग़लत काम करना मना है। लेकिन यही नहीं रमज़ान के रोज़े यह सीख भी देते हैं कि, जो जनहित और नेकी के काम हमने पूरे रमज़ान यानि एक महीने तक किये, उसे पूरी ज़िंदगी के लिए करना चाहिए। रमज़ान के दौरान व्यक्ति को मन शुद्ध रखना होता है। इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा दान-पुण्य और इबादत करने की ताक़ीद की जाती है। इसके अलावा पूरे साल में किए गए अपने गुनाहों के लिए अपने रब से माफ़ी मांगना भी इबादत का ही हिस्सा माना जाता है।

यूँ तो इस्लाम में सदक़ा, ज़कात और फ़ितरा जैसे विभिन्न नियम के तहत दान को बहुत महत्व दिया गया है लेकिन रमज़ान के महीने में दान की अहमियत बढ़ जाती है। इस महीने में अधिक से अधिक लोग ग़रीबों में दान करते हैं, जिसे ज़कात कहते हैं। साथ ही ईद के दिन, ईद की नमाज़ से पहले फ़ितरा दिया जाता है। यह भी एक तरह का दान है। फ़ितरा अदा करना हर मुसलमान पर वाजिब है और ज़कात प्रत्येक मालदार बालिग़ व आक़िल मुसलमान पर फ़र्ज़ है जो साहिबे निसाब हैं। जो शख़्स ज़कात नहीं अदा करता वह बहुत बड़ा गुनहगार माना जाता है। पैग़ंबर मोहम्मद साहब का इरशाद है कि, 'फ़ितरा अदा न करने वाला मेरी ईदगाह में नमाज़ पढ़ने न आए।' रमज़ान के इस मुबारक महीने में इस्लाम में ऐसी व्यवस्था की गई है, जिससे हर ग़रीब और बेसहारा लोग ईद का त्योहार मना सकें। ज़कात-फ़ितरा के रूप में जो पैसा ग़रीबों में तकसीम किया जाता है उससे उन ग़रीबों के घर भी ख़ुशियां आती हैं जो इस लायक़ नहीं हैं कि अच्छे से ईद मना सकें।

पवित्र क़ुरआन के अनुसार साल भर की कमाई का ढाई प्रतिशत ज़कात के रूप में मिस्कीनों को हर हाल में दान करना ही होगा। फ़तावा आलमगीरी और फ़तावा शामी के अनुसार वह माल जो एक साल गुज़रने के बाद ख़र्चों से बचा हुआ हो, साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी हो या फिर उसके बराबर का माल हो तो ज़कात दी जाएगी। वहीं फ़ितरा घर के प्रत्येक सदस्य पर पौने तीन किलो गेहूं या इसके बराबर की क़ीमत देना वाजिब है। यदि किसी के पास नक़द रकम घर में हो, बैंक के खातों में हो, डाकख़ाने में जमा हो, बैंक सर्टिफ़िकेट के रूप में हो, विदेशी करंसी की सूरत में हो, फ़ैक्ट्री में तैयार या कच्चे माल की शक्ल में हो, शेयर्स की सूरत में हो या फिर मकान और दुकान आदि की आमदनी के रूप में हो, सभी पर ज़कात है और इस माल का ढाई प्रतिशत हिस्सा ज़कात के तौर पर अदा करना फ़र्ज़ है। एक और ख़ास बात यह कि, ज़कात में दी जाने वाली कमाई कोई काली कमाई नहीं होनी चाहिए। वह व्‍यक्ति की मेहनत की कमाई होनी चाहिए। ज़कात और फ़ितरा फ़क़ीरों, मिसकीनों, राहगीरों, असहाय और मोहताजों को देना बेहतर है। क़ुरआन में रसूल से मुख़ातिब होकर अल्लाह फ़रमाता है, "वह आप से पूछते हैं, क्या कुछ ख़र्च करें? आप कह दें जो माल तुम ख़र्च करो, सो माँ बाप के लिए और क़राबतदारों, (रिश्तेदारों) के लिए, और यतीमों और मोहताजों और मुसाफ़िरों के लिए। और तुम जो नेकी करोगे तो बेशक़ अल्लाह उसे जानने वाला है।"- (अल-क़ुरआन- २:२१५)

ज़कात को लेकर इस्लाम में कई शिक्षाप्रद बातें कहीं गई हैं। इस्लाम कहता है कि, व्‍यक्ति जितना ज़्यादा जकात देगा, उतना ही कमाएगा। इससे उसे जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। ज़कात देने से बरकत आती है और उस इंसान की तरक़्क़ी होती है। ज़कात देने से ग़रीब लोगों के दिलों की नफ़रतें ख़त्म होती हैं, तथा प्‍यार और सम्‍मान बढ़ता है। ज़कात से धन का प्रवाह संतुलित हो जाता है। जो लोग ग़रीब होते हैं उनकी ज़रूरतें पूरी हो जाती है और जो भूखे होते हैं, उन्‍हें भरपेट भोजन मिल जाता है। ज़कात देने से मन शुद्ध होता है और हर मुसलमान का अल्‍लाह के साथ मज़बूत रिश्‍ता हो जाता है। उसका अल्‍लाह पर भरोसा और विश्‍वास बढ़ जाता है। ज़कात ग़रीबों और अमीरों के बीच के फ़र्क़ को कम कर, दोनों के बीच के अंतर को मिटा देता है।

ज़कात के ज़रिये समाजसेवा का बड़ा काम किया जा सकता है। ज़कात के ज़रिये ही क़ौम के ज़रूरतमंद, ग़रीब और यतीम बच्चे, विधवा औरतें, विकलांग, फ़क़ीर या दूसरे तरह के ग़रीब लोगों की मदद की जा सकती है। ज़कात के धन का सही इस्तेमाल कर शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में मुसलमान क्रांति ला सकते हैं। ज़कात का सही इस्तेमाल कर आर्थिक बदहाली से कई ग़रीब मुसलमानों को निकालकर अपने पैरों पर खड़ा किया जा सकता है। क़ौम के बड़े-बुज़ुर्गों ख़ासकर धर्मगुरुओं और मस्जिदों के इमामों को ज़कात के महत्व और उसके इस्तेमाल की सही तालीम पर बहुत काम करने की ज़रूरत है। अगर ज़कात का सही नज़्म स्थापित कर दिया जाए तो नतीजे मिलने शुरू हो जाएंगे और मुस्लिम क़ौम बदहाली से निकल सकेगी। बताते चलें कि, इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा के घोषित हुए परिणाम में उत्तरप्रदेश के ज़कात फ़ाउंडेशन की मदद से १८ अभ्यर्थी कामयाब हुए हैं। सच्चर समिति की सिफ़ारिशों के ज़रिये देश में मुसलमानों की बदहाली सामने आने के बाद फ़ाउंडेशन ने ९ साल पहले क़ौम के प्रतिभाशाली बच्चों को यूपीएससी जैसी परीक्षा की तैयारी कराने का बीड़ा उठाया था। जिसके नतीजे आने शुरू हो गए हैं। मज़े की बात यह है कि अब इस फ़ाउंडेशन को सभी धर्मों के लोग आर्थिक मदद करने लगे हैं। मुस्लिम समाज की तरक़्क़ी में, देश के अन्य धर्मावलंबियों के सहयोग की ज़रुरत अगर क़ौम को चाहिए तो ख़ुद उसे पहले अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।