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आरक्षण का तिलिस्मी मकड़जाल /सैयद सलमान
Friday, January 11, 2019 10:07:37 AM - By सैयद सलमान

सैयद सलमान
साभार- दोपहर का सामना 11 01 2019

केंद्र की मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्णों के आरक्षण की घोषणा कर सियासी हलचल मचा दी है। मोदी सरकार ने सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में १० प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ैसला किया है। यह मौजूदा ५० प्रतिशत आरक्षण से अलग होगा। आरक्षण लागू हो जाने पर यह आंकड़ा बढ़कर ६० फ़ीसदी हो जाएगा। फ़ैसले को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद १५ और १६ में संशोधन करना होगा। इसका लाभ ईसाइयों व मुस्लिमों सहित 'अनारक्षित श्रेणी' के लोगों को नौकरियों व शिक्षा में मिलेगा। इस कोटा में किसी भी आरक्षण के प्रावधान के तहत नहीं आने वाले वर्गों जैसे, ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, जाट, गुज्जर, मुस्लिम व ईसाई शामिल होंगे। सरकार की इस घोषणा से मुस्लिम आरक्षण की मांग करने वाले नेताओं की समझ में नहीं आ रहा है कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दें। ठेठ मुस्लिम राजनीति करने वाले नेताओं ने इस निर्णय से असहमति ज़रूर जताई है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रावधान से पहले सामान्य आरक्षण श्रेणी में ओबीसी सहित अन्य आरक्षणों का लाभ मुसलमानों की कई बिरादरी को मिलता रहा है। संविधान में आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता रहा है। किसी की आय या संपत्ति के आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान अब तक नहीं रहा है। संविधान के अनुच्छेद १६(४) के मुताबिक आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है। किसी व्यक्ति विशेष को आरक्षण देने का संविधान में कोई नियम नहीं है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के फ़ैसलों पर रोक लगा चुका है। अपने पूर्व के फ़ैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने को समानता के मूल अधिकार का उल्लघन बताया था। लेकिन महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण और तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण की गहमागहमी में मुसलमान अपने आरक्षण की मांग पर ज़ोर देने लगा है। लेकिन जब से केन्द्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्ण जातियों को भी आरक्षण का लाभ देने की बात कही है तबसे मुसलमानों में और भी बेचैनी पाई जा रही है। कांशीराम के नारे 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी भागीदारी' को वह पैमाना मानकर अपनी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण चाहता है। जिसकी कोई गुंजाईश नज़र नहीं आती।

देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग को आरक्षण हैं। पिछड़ा वर्ग में ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ को छोड़कर पूरा हिंदू समाज शामिल है। वहीं मुसलमानों में भी केवल सैयद, शेख, मुगल और खान-पठान को छोड़कर लगभग पूरा मुस्लिम वर्ग शामिल है। अगर आरक्षण लागू होता है तो बाकी सवर्णों की तरह शेख, सैयद, पठान और मुग़ल को भी आरक्षण का लाभ मिल सकता है। इसमें एक धार्मिक और दूसरा सामाजिक पेंच है। दीनी ऐतबार से मुसलमानों में मज़हबी और सामाजिक तौर पर जाति व्यवस्था और ऊंच-नीच का कोई चलन नहीं है। दूसरी बात ये कि अगर कोई यह दावा करे कि मैं सैयद, पठान, मुग़ल या शेख हूँ तो वो साबित कैसे करेगा? हालांकि मुस्लिम जीवन का व्यवहारिक पहलू यह है कि उसमें अनगिनत जातियां और उपजातियां हैं। भले ही मुस्लिम समाज के ठेकेदार न मानें लेकिन मुसलमानों में भी वर्ण और वर्गभेद का ज़बरदस्त बोलबाला है जो सही इस्लाम की नज़र में सरासर ग़लत है।

बात आरक्षण की नहीं अगर केवल मुस्लिम समाज के भीतर की करें तो वहाँ भी वर्णव्यवस्था के विरोध में आवाज़ बुलंद करने वाले इस्लाम की असल मान्यताओं के ख़िलाफ़ हर तरह के भेद पाए जाते हैं। फ़िरक़ों के भेद के अलावा भी मुसलमानों में बिरादरीवाद का बोलबाला है। सैयद बिरादरी का दावा है कि वो पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद साहब के वंशज हैं, जिसके चलते समाज में उन्हें ऊंचा ओहदा मिला है। सैयद का अर्थ है मुखिया या श्रीमान। वहीं मुग़लों और पठानों का मानना है कि है कि वे सेनाओं का संचालन करने के साथ ही दूसरे समुदाय को सुरक्षा देते थे और हुकूमत भी करते थे इसलिए श्रेष्ठ हैं। मुगल भी पठानों में से ही एक हैं। दूसरे शब्दों में उदाहरण दिया जाए तो पठान और मुग़ल क्षत्रियों की तरह योद्धा बिरादरी मानी जाती है। एक बात और, मुस्लिम समाज में शेख कोई बिरादरी नहीं थी बल्कि बुज़ुर्ग के लिए इस्तेमाल होने वाला लक़ब था। अरबी में शेख का मतलब होता है बुज़ुर्ग। शेखों के बारे में कहा जाता है कि एक बुज़ुर्ग हुए थे जो अपने नाम के साथ शेख लिखते थे। इसी वजह से उनके आसपास के लोग भी शेख लिखने लगे और शेख लिखने वालों ने अपने को एक अलग वर्ग मान लिया। यानि वर्णव्यवस्था ने मुसलमानों को इस तरह जकड़ लिया कि उच्च जातियों से संबंधित मुसलमान आमतौर से अपने अंदर श्रेष्ठता का भाव रखने लग गए और निम्न जातियों को अपने स्तर का कभी समझा ही नहीं।

वैसे, राजनैतिक विरोधाभास के बावजूद इस बात से किसी को भी इनकार नहीं है कि आज़ादी के बाद पिछले क़रीब सात दशकों के दौरान देश का काफ़ी विकास हुआ है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इसमें सभी तबक़ों और समूहों की समुचित भागीदारी नहीं हो सकी है। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह मुसलिम समुदाय की त्रासदी यह रही कि वह सही रहनुमा और दूरदर्शिता के आभाव में एक तरफ़ तो विकास की प्रक्रिया में हाशिये पर पहुँच गया तो दूसरी तरफ़ असुरक्षा, भेदभाव, संदेह और तुष्टीकरण के आरोपों का भी शिकार रहा। देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक दशा जानने के लिए यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष २००५ में जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। ३० नवंबर, २००६ को लोकसभा में पेश की गई ४०३ पन्नों की रिपोर्ट से पहली बार ज्ञात हुआ कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति से भी ख़राब है। सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट के ज़रिये मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन और ठोस आंकड़ों की बुनियाद पर सच्चाई को देश के सामने लाने का काम किया। उन सच्चाइयों को रेखाकिंत करते हुए उन्हें औपचारिक स्वीकृती दिलाई जिन पर पहले ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। साथ ही साथ मुस्लिम समाज को लेकर इस रिर्पोट में बहुत सारे ऐसे मिथकों, भ्रामक दुष्प्रचारों व तुष्टीकरणी के आरोपों को भी झूठा साबित किया गया जिसे एक बड़ा जनसमूह सच माने बैठा था।

सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि किस तरह से मुसलमान आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं और सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व केवल ४.९ प्रतिशत है। इसमें भी ज़्यादातर वे निचले पदों पर हैं। उच्च प्रशासनिक सेवाओं, जैसे आईएएस, आईएफ़एस और आईपीएस जैसी सेवाओं में उनकी भागीदारी सिर्फ़ 3.२ प्रतिशत है। सच्चर समिति ने हालात को देखते हुए मुस्लिम समुदाय की स्थिति को सुधारने के लिए कई सुझाव भी दिए थे और अनेक सिफ़ारिशें की थीं। लेकिन सवाल यह है कि उम्मीद जगाने वाली इस रिपोर्ट और सिफ़ारिशों के जारी होने के १२-१३ सालों में क्या मुसलमानों के हालात ज़रा भी बदले नज़र आते हैं? क्योंकि सिफ़ारिशें ज़्यादा थीं और पहल नाकाफ़ी। जो थोड़े बहुत क़दम उठाये भी गये उनका ज़मीन पर कोई ख़ास प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्ण जातियों को भी आरक्षण देने का लाभ जब मुसलमानों को भी मिलेगा तब देखना यह होगा कि कितने मुसलमान इस स्थिति का लाभ उठा पाने में सक्षम होंगे।

जहां तक मुसलमानों के बीच वर्गीकरण की बात है तो चंद मौलवियों और समाज के ठेकेदारों द्वारा बनाई गई सामाजिक वर्ण व्यवस्था का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है। मुसलमानों का धार्मिक सिद्धांत जाति, वर्ण या मसलकी विचारधारा के आधार पर विभाजन को सख़्ती से मना करता है। क़ुरआन में तो यहां तक कहा गया है कि जो लोग मसलक या जाति के आधार पर विभाजन पैदा करते हैं वह सरासर अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं। ऐसे में आरक्षण की इस बंदरबांट में मुसलमानों को फूंक-फूंक कर क़दम रखने की ज़रुरत है। वर्तमान आरक्षण की घोषणा कहीं सिर्फ़ राजनैतिक लाभ के लिए ही न हो इस बात पर भी ख़ासतौर पर ग़ौर करने की ज़रुरत है। बेहतर शिक्षा, बेरोज़गारी से जंग और देशवासियों का विश्वास क़ायम रखना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए। और यही बात उसे राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने में मददगार होगी वरना आरक्षण का तिलिस्मी मकड़जाल उसे तरक़्क़ी देने के बजाय राह से भटकी क़ौम बनाकर रख देगा।