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बदलते समीकरण… मुस्लिम मतों का जुगाड़ / सैयद सलमान
Friday, November 13, 2020 - 10:26:45 AM - By सैयद सलमान 

बदलते समीकरण… मुस्लिम मतों का जुगाड़ / सैयद सलमान
पार्टी की नीतियों और समाजोत्थान को चुनने के बजाय वोटों का ध्रुवीकरण समाज के लिए घातक है
साभार- दोपहर का सामना 13 11 2020

बिहार के मतदाताओं ने आख़िर एनडीए सरकार बनाने मर मुहर लगा दी। कोई बड़ा राजनैतिक उलटफेर न हुआ तो भाजपा के सहयोग से नितीश की सरकार बनना तय है। कुल मिलाकर कांटे के मुक़ाबले में तेजस्वी ने अपने दम पर केंद्र के बड़े भाजपा नेताओं और राज्य के मुखिया और कभी ग़ैर-भाजपा दलों के प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार रहे नितीश कुमार को बुरी तरह घेरा। अक्सर क्रिकट, हॉकी या किसी भी खेल में देखा जाता है कि हारने वाली टीम को जीतने वाली टीम या खिलाड़ी से ज़्यादा सराहना मिलती है। यही तेजस्वी के साथ हो रहा है। देश भर के अनेक बड़े दल के नेताओं और राजनैतिक विश्लेषकों ने तेजस्वी की सराहना की है। लालू की ग़ैर-मौजूदगी में चुनाव लड़ रहे तेजस्वी ने आने वाले कल के लिए अच्छी ख़ासी ज़मीन तैयार कर ली है। मुस्लिम समाज का अगर भटकाव न होता तो शायद तेजस्वी सरकार बनाने में भी सफल हो जाते। बिहार के सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं का इस बार ओवैसी की पार्टी एमआईएम के प्रति ज़बरदस्त झुकाव देखा गया। ओवैसी की पार्टी ने इस बार बिहार में बीस सीटों पर चुनाव लड़ा और पांच सीटों पर जीत हासिल की। मुस्लिम मतदाताओं का समय-समय पर बदलता यही रवैया उनके लिए हमेशा परेशानी का सबब रहा है। किसी दल के प्रति अचानक प्रेम उमड़ना, कभी उसे अचानक छोड़ देना, कभी नए दल को आज़माना, कभी पुराने किसी उस दल की तरफ़ लौटना जिसके पिछलग्गू रहने का इल्जाम झेलते रहे हों, यह दर्शाता है कि मुस्लिम समाज ने कई बार समझदारी का परिचय देते हुए भी कई बार अपरिपक्व फैसले लिए हैं।

इस बार २४३ सदस्‍यीय बिहार असेंबली में १९ मुस्लिम विधायक दिखाई देंगे। इनमें से ८ विधायक आरजेडी, ५ एमआईएम, ४ कांग्रेस, १ सीपीआई(एम-एल) और १ बीएसपी का है। जेडीयू ने ११ मुस्लिम विधायकों को टिकट दिया था, लेकिन कोई भी नहीं जीत पाया। ओवैसी की एआईएमआईएम के मैदान में आने की वजह से मुस्लिम मतों के बड़े दावेदार रहे आरजेडी और कांग्रेस को सीटों का ठीक-ठाक नुक़सान तो हुआ है। आंकड़ों पर न जाते हुए भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि ओवैसी ने मैदान में उतरकर मुस्लिम मतों में सेंध लगाने का काम किया। भले ही जिन सीटों पर वह हारे वहां मतों का समीकरण यह बताता हो कि उनकी वजह से आरजेडी या कांग्रेस न हारी हो लेकिन ओवैसी एक ऐसा चेहरा बन चुके हैं जिनके मैदान में उतरते ही मतों का ध्रुवीकरण हो जाता है और उसका सीधा लाभ भाजपा को होता है। शायद इसीलिए अक्सर ओवैसी को भाजपा की 'बी टीम' कहा जाता है। हालांकि यह ओवैसी का लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह कहीं से भी अपनी पार्टी को चुनाव लड़वाएं लेकिन जब मुस्लिम बहुल इलाकों में उनके उम्मीदवार उतरकर मतों का ध्रुवीकरण करते हैं तो उंगलियां उठना स्वाभाविक है। मुस्लिम मतों का यही ध्रुवीकरण उनकी विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा करता है।

मुस्लिम राजनीति का एक मसला नई पीढ़ी का राजनैतिक रूप से प्रयोगात्मक रवैया भी है। राजनीति में नई पीढ़ी को जगह नहीं मिल पा रही है। सभी स्थापित दलों में पुराने लोग ही अपना स्थान जमाकर बैठे हैं। जबकि नई पीढ़ी का मुस्लिम वोटर अपने लिए नया चेहरा तलाशता है। कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद, भाजपा के शाहनवाज हुसैन, मुख़्तार अब्बास नक़वी, सपा के आज़म खान, आरजेडी के अब्दुल बारी जैसी पुराने चेहरे धीरे-धीरे अब अपनी पैठ खोते जा रहे हैं। उनके मुक़ाबले मुस्लिम मतदाता मुलायम, लालू, ममता, यहां तक कि भाजपा का सहयोग लेने के बावजूद नितीश तक को ज़्यादा महत्व देते हैं। ऐसे में भावनात्मक लेकिन तर्कपूर्ण मुद्दों में अपनी ठेठ मुस्लिम शैली में आवाज उठाने वाले ओवैसी एक विकल्प बनकर उभरते हैं। बड़ी महारत से वह अपने आपको मुस्लिम मतों का एकछत्र मसीहा साबित करने में सफल होते हैं। आंध्रप्रदेश, तेलंगाना से निकलकर महाराष्ट्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके ओवैसी हर उस राज्य में अपना राजनैतिक भाग्य आज़माना चाहते हैं जहां मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में नतीजों में उलट-फेर की सलाहियत रखते हों। उत्तरप्रदेश और बिहार उन्हें यह मौक़ा देते हैं। अब चाहे उन्हें भाजपा का दलाल कहा जाए या मुसलमानों का मसीहा लेकिन वह पूरी शिद्दत के साथ नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। यह उनकी सफलता तो हो सकती है लेकिन क्या मुसलमानों को यही चाहिए? सारा दारोमदार इसी सवाल पर आकर टिक जाता है।

पहले से ही नेतृत्व को लेकर उहापोह की स्थिति का शिकार रहा मुस्लिम समाज ओवैसी को लेकर भ्रमित भी होता है और आकर्षित भी। ओवैसी भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से मुस्लिम मतों पर अपना प्रभाव छोड़ते नजर आते हैं। अंग्रेजी की एक कहावत ओवैसी पर पूरी तरह फ़िट बैठती है जिसका भावार्थ है, 'आप मुझसे प्यार कर सकते हैं या मुझसे नफ़रत कर सकते हैं, लेकिन आप मुझे अनदेखा नहीं कर सकते।' मुस्लिम मतों में सेंध लगाकर कथित सेक्युलर दलों को नुक़सान पहुंचाते हुए भी, बिहार में अपनी पार्टी के लड़ाए गए उम्मीदवारों के हिसाब से २५ प्रतिशत की कामयाबी उनकी इसी रणनीति की देन है। अब ओवैसी की वजह से कितनी सीटें हारे के बजाय, कितनी सीटें जीते, इस पर चर्चा होगी और ओवैसी मनोवैज्ञानिक रूप से मुस्लिम समाज के राजनैतिक योद्धा कहलाने के हक़दार हो जाएंगे।

दरअसल कांग्रेस, एनसीपी, समाजवादी पार्टी, आरजेडी या अन्य कथित सेक्युलर पार्टियां मुसलमानों को अपना बंधुआ वोटर समझती रही हैं। जबकि मुस्लिम समाज अब बदलाव चाहता है। यही वजह है कि बिहार की कई सीटों पर लंबे समय से जीतते आ रहे उम्मीदवारों को इस बार जनता ने पूरी तरह नकार दिया। बिहार के अनेक ठिकानों पर मुसलमानों की मांग थी कि कांग्रेस और आरजेडी अपने पुराने उम्मीदवारों को बदल दे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी हठधर्मिता की वजह से एमआईएम को अपनी ज़मीन मज़बूत करने का मौका मिल गया। ओवैसी की रणनीति कुछ अलग है। वह अन्य दलों से आए नेताओं के बजाय नए चेहरों को ज्यादा तरजीह देते हैं ताकि मुस्लिम मतदाताओं को थोड़ा बदलाव महसूस हो। महाराष्ट्र में इम्तियाज़ जलील इसका सबसे बड़ा उदहारण हैं। पत्रकार रहे इम्तियाज़ जलील को पहले विधायक और फिर सांसद का चुनाव लड़वाकर दोनों में कामयाबी दिलाकर उन्होंने परिवर्तन लाने का संदेश दिया। यही प्रयोग मुस्लिम मतदाताओं को मनोवैज्ञानिक रूप से आकर्षित कर गया। स्थापित और घिसे-पिटे नेताओं के बजाय ओवैसी और उनके प्रत्याशियों पर उन्हें ज़्यादा विश्वास नज़र आया और नतीजा सामने है।

इसमें अब कोई दो राय नहीं रही कि मुस्लिम मतदाता अपनी अलग पहचान चाहते हैं। वो नहीं चाहते कि उन्हें सिर्फ़ बीजेपी या उनके समर्थक दलों को हराने वाले वोट बैंक के तौर पर देखा जाए। वो अपने इलाक़े में बदलाव चाहते हैं, विकास चाहते हैं। लेकिन भाजपा की नीतियों से उनके विचार मेल नहीं खाते इसलिए उसकी काट के रूप में वह भाजपा विरोधी दलों की तरफ़ स्वाभाविक रूप से जुड़ जाते हैं। अगर ऐसी ही स्थिति लगातार बनी रही तो मुस्लिम मतों के ठेकेदार नेताओं के लिए यह सोचने का मक़ाम है कि उनसे चूक कहां हो रही है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि ओवैसी की पार्टी से गठबंधन न करने के क्या कारण हैं? क्या उनकी पार्टी की लोकप्रियता से कांग्रेस, एनसीपी, सपा, आरजेडी वगैरह को समस्या है? या मुस्लिम मतों का रुझान समझ पाने की उनमें सलाहियत नहीं रही? ओवैसी की कामयाबी आने वाले कल के लिए मुसलमानों के लिए कहीं और समस्या न खड़ी करे इस बात का ख़्याल रखना होगा। पार्टी की नीतियों और समाजोत्थान को चुनने के बजाय वोटों का ध्रुवीकरण समाज के लिए घातक है। ओवैसी को या तो सेक्युलर दलों के साए में लाकर उनका इस्तेमाल करना होगा या फिर उन पर इल्ज़ाम लगाना छोड़कर अपनी रणनीति बदलकर मुस्लिम मतों को साथ लाने का प्रयत्न करना होगा। याद रखें, ओवैसी खुले सांड की तरह राजनैतिक मैदान में विचरण करने के लिए स्वतंत्र हैं। जो उनकी राह में आएगा वह उसे सींग मारने का काम करेंगे। क्या स्वघोषित सेक्युलर दल इन बातों को लेकर गंभीरता से विचार करने की मनःस्थिति में हैं या फिर मुस्लिम राजनीति बस ध्रुवीकरण का मोहरा बनकर ही रहने का अभिशाप झेलती रहेगी?


(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग फैकेल्टी हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)