Saturday, November 28, 2020

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एक अभिनेता की संघर्ष गाथा
Monday, September 28, 2020 12:18:50 AM - By फ़िल्म डेस्क

अशरफ फ़ारूक़ी
मैं अशरफ़ फ़ारूक़ी..मेरा जन्म 25 अगस्त को गोरखपुर के एक मुस्लिम परिवार में हुआ ...बचपन से ही गाने की तरफ़ मेरा रुझान ज़्यादा रहा है...घर में सारा दिन टेप रिकार्डर पर रफ़ी साहब,किशोर दा और मुकेश जी के गाने बजते रहते थे...इसी माहौल में बड़ा हुआ ...पढ़ाई में बस इतना था के द्वित्तीय श्रेणी से पास हो जाता था...पढ़ने से ज़्यादा खेल कूद और संगीत में दिलचस्पी थी...जिस उम्र में बच्चे खिलौने वाली बंदूक़ से खेलते हैं मैं गिटार,ड्रम और अन्य वाद्य यंत्र के खिलौनो से खेलता था..टेप रिकार्डर पर गाने लगा कर उसको बड़े ध्यान से सुनता और उसको एक डायरी में लिखता था...गाना जब याद हो जाता तो घर में घूम घूम गाया करता...शौक़ इस क़दर बढ़ गया के स्कूल में घर पर आने वाले मेहमानों को सबको सुनाने लगा...कोई भी नयी फ़िल्म आती तो ज़िद करके उसका कैसेट मंगा लेता और अपना पसंदीदा गाना तैय्यार करता और डायरी में लिख के याद करता और फिर जल्द से जल्द उसको गाने लगता...बाबा बतातें हैं कि जब मैं 3 साल का था तभी से सारे कैसेट्स को पहचानने लगा था . बस गाने का नाम बताते ही वो कैसेट निकाल लाता था...कॉलेज के दिनों में किसी ने बताया के गाने की प्रतियोगिता हो रही है ज़िला स्तर पर फ़ौरन पता किया और फ़ार्म भरने के लिये पहुँच गया वहाँ पता चला के अगले हफ़्ते अॉडिशन होगा उसी वक़्त नाम लिखवाना है...अब तो सारा दिन बस यही सोचता रहता के जल्द से जल्द ऑडिशन का दिन आए और मैं सारे शहर के सामने गाऊँ... ख़्वाब में भी यही देखता कि गा रहा हूँ और लोग तालियाँ बजा रहे हैं...भीड़ मेरा नाम ले रही है ज़ोर ज़ोर से फिर आँखें खुल जातीं थीं...आख़िर ऑडिशन का दिन आया और मैं भीड़ देख कर इतना नर्वस हो गया कि पैर काँपने लगे...बस गाना गाये जा रहा था...मैं अपने पहले ही इम्तिहान में फ़ेल हो गया...सारे ख़्वाब एक एक करके टूटते नज़र आ रहे थे...मुझे लगा कि मैं घर में ही गाना गा सकता हूँ....एक दिन सोचा चलो एक दर्शक बनके जो प्रतियोगी हैं उनको ही देख आता हूँ... मगर वहाँ इतनी भीड़ थी कि देख पाना मुश्किल था....किसी ने रफ़ी साहब का गाना गाया तो दीवार फाँद के उसको देखने की हसरत लिये जैसे तैसे अंदर पहुँत गया...मगर स्टेज के पास खड़े गार्ड की नज़र पड़ गयी और उसने धक्के देते हुए बाहर कर दिया....उसी वक़्त सोच लिया कि अब अगली प्रतियोगिता की तैय्यारी करनी है और जब मैं स्टेज पर गाउँगा तब कोई गार्ड मुझे धक्के नहीं देगा...अपनी बेबसी पर थोड़ा रोया और घर चला आया...अब मैं दोस्तों के साथ चलते चलते कॉलेज कैम्पस में सड़कों पर अचानक गाने लगता जो़र जो़र से सब लोग देखने लगते....ये सिलसिला चलता रहा और अब मुझे भीड़ से घबराहट होना बंद हो गयी थी...अब मैंने अपनी पुरानी डायरी निकाली और उसमें से गाने चुने...अगली प्रतियोगिता का दिन आ गया मेरे हौसले बुलंद थे...जब गाया तो लोग मंत्रमुग्ध हो कर सुनने लगे और मैं वो मुक़ाबला जीत गया कॉलेज के दिनों से सलमान ख़ान सर का बहुत बड़ा फ़ैन था इसलिये कसरत किया करता था.. मुक़ाबले के वक़्त मॉडलिंग एजेन्सी वालों की नज़र मुझपर पड़ी उन्होंने मॉडलिंग का ऑफ़र दिया और मैंने हाँ कर दी।

रैंप मॉडलिंग करने के साथ साथ ग्रैजुएशन की पढ़ाई भी कर रहा था मगर शहर में गणित और कम्प्यूटर्स की तय्यारी ठीक से ना हो पाने की वजह से बैक लॉग लग गयी... अचानक एक दिन अख़बार में ख़बर पढ़ी के हमारे शहर में फ़िल्म एण्ड थियटर वर्कशाप होने वाली है जिसमें गायन और संगीत भी सिखाएंगे ..मैं पहुँच गया और उनके साथ शामिल हो गया लेकिन वो लोग गायन पर ज़्यादा समय नहीं देते थे सिर्फ़ क्लास शुरू होने पे सरगम की प्रैक्टिस करते फिर किसी ड्रामा की रिहर्सल करने लगते...मैंने कुछ दिन देखा फिर गुरुजी से पूछा कि मैं तो गायन के लिये आया हूँ...उन्होंने बड़े प्यार से समझाया कि ये एक्टिंग वर्कशॉप है अख़बार में ग़लती से संगीत और गायन भी लिख दिया क्योंकि हम शुरूआत सरगम से करते हैं शायद इसी लिए...एक महीने की बात है आप करना चाहो तो करलो वैसे भी हम फ्री में सिखा रहे हैं...मैंने सोचा वर्कशॉप मेरे घर के नज़दीक है सिर्फ़ एक सड़क का फ़ासला है
और कला का ये माहौल मुझे एक अलग ही दुनिया में ले जाता था...वहाँ न तो गणित के मुश्किल सवाल होते ना ही दिन भर बैठ के रट्टा लगाना सिर्फ़ दिये हुए किरदार को आत्मसात करना और उसी में जीना उसके बारे में सोचना वो कैसे चलेगा कैसे बात करेगा कैसे सोचेगा.. मुझे अब इसमें एक अलग ही मज़ा आ रहा था...अब पूरी तैय्यारी हो चुकी थी और हमको आज दर्शकों के बीच में अपना नाटक पेश करना था..एक जोश था एक उमंग थी...तभी हमारे गुरुजी ने बताया कि हमको माइक नहीं दिया जायेगा इसलिये अपनी आवाज़ को बुलंद रखना पड़ेगा...हमारा इम्तिहान सख़्त होता जा रहा था लेकिन हमलोगों ने 3 नाटक किये दर्शकों की तालियों से पूरा माहौल गूँज उठा...ख़ुशी से मेरी आँखें छलक उठीं....मेरे काम की सबने बहुत तारीफ़ की ख़ासतौर से गुरू श्री मानवेन्द्र त्रिपाठी जी ने कहा के "तुम्हारे इमोशन्स,शब्दों का उच्चारण और गायक होने की वजह से आवाज़ में बेस और मॉड्यूलेशन बहुत प्यारा है तुम गायक बनना चाहते हो वो अलग बात है मगर तुम्हारे अंदर एक एक्टर की सारी ख़ूबियाँ हैं" उस दिन से मैं उनके साथ हो लिया और उनके अगले नाटक की तैय्यारी में लग गया...अचानक डाक्टर ने बताया कि मेरे बाबा को कैंसर है घर में सबसे बड़ा होने की वजह से मैं काम की तलाश में निकल पड़ा...सारे ख़्वाब टूटते हुए नज़र आए...एक किताब बेचने की फ़र्म में जॉब करने लगा ....सेल्समैन की जॉब थी सारा दिन तेज़ धूप में शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक किताबों का बैग लिये मारा मारा फिरता शाम को जब घर पहुँचता तो इतना थक चुका रहता कि खाना खा के सो जाता...बाबा को इलाज के लिये मुम्बई ले जा रहे थे किसी टाटा हास्पिटल में...दिन भर सिर्फ़ यही दुआ मांगता के बाबा ठीक हो जायें जल्दी और फिर काम पे निकल जाता था कॉलेज की पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पा रही थी...वक़्त ही नहीं मिलता था...लेकिन कहते हैं ना कि बुरे वक़्त के बाद अच्छा वक़्त भी आता है...बाबा ठीक होके घर आगये थे मैं वापस अपने पुराने रूटीन पर आ गया..
शहर में पढ़ाई का सही माहौल नहीं मिला तो हैदराबाद चला गया और वहाँ रह कर ग्रैजुएशन के साथ ही साथ कॉल सेंटर में जॉब भी करने लगा ....जल्द ही बैक लॉग से निजात मिल और मैं ग्रैजुएट हो गया...बचपन से ही बड़ा भावुक हूँ ग़म में तो रोता ही था ख़ुशी में भी आँखें नम हो जातीं थीं...जब अपना ग्रैजुएशन का रिज़ल्ट देखा तो ख़ुशी के मारे रो दिया...अब सोचा कि कोई नौकरी की जाये अच्छी सी और अम्मी बाबा का ख़्वाब पूरा किया जाये...बहुत कोशिश के बाद पुणे की एक आई टी फ़र्म में जॉब मिल गयी.. एक साल भी नहीं हुआ था कि अचानक मंदी की वजह से वह नौकरी हाथ से चली गयी...मगर वहाँ एक ऑर्केस्ट्रा ग्रुप से पहचान हो गयी जो रिज़र्व बैंक के बड़े बड़े शोज़ ऑर्गनाइज़ करते थे....उनके साथ कुछ शोज़ किये तो लगा कि यही वो काम है जो मैं पूरा मन लगा के कर सकता हूँ और मुझे पसंद भी है लेकिन फिर घर वालों का ख़्याल आया और नौकरी के लिये भटकना शुरू कर दिया...उसी दौरान एक फ़िल्म देखी 3 ईडियट्स अब मैंने फ़ैसला कर लिया था कि अपने सपनों को पूरा करना है नौकरी की तलाश चल रही थी कि अचानक एक दिन मेरी छोटी बहन का फो़न आया कि "भइया बाबा ने कहा है कि तुमको जो पसंद है वो बनो हमलोग तुम्हारे साथ हैं घर की फ़िक्र मत करो अपने ख़्वाबों को पूरा करो छोटे भइया को अच्छी नौकरी मिल गयी है तुम परेशान मत हो"...इस एक फो़न ने मेरी सारी परेशानियाँ दूर करदीं और मैं चल पड़ा ख़्वाबों के शहर मुम्बई के लिए...वहाँ एक दोस्त से पहले ही रहने की बात करली थी जो पहले पुणे में साथ में रहता था ....मैं अब मुम्बई पहुँच चुका था।

मुम्बई में मैं सिर्फ़ कुछ लोगों को ही जानता था...मेरा रूममेट,मेरे कॉलेज का दोस्त,मेरे दो भाई एक फुफेरे एक ख़लेरे यानि मौसेरे...दोनो ही मुम्बई काफ़ी पहले आ गये थे और रोटी कपड़ा और मकान का इंतज़ाम कर चुके थे जो कि मुम्बई में क़िस्मत वाले ही कर पाते हैं....मुझे अब काम चाहिये था ताकी अपना गुज़ारा कर सकूँ...मेरे ख़लेरे भाई ने दो दिन के अंदर मुझे एक इवेण्ट कम्पनी में जॉब दिला दी...मार्केटिंग की जॉब थी जिसका मुझे 15-20 दिनों का तजुर्बा था मगर पुणे में मैंने बी.डी.ई. की पोस्ट पे काम किया था जिसका तजुर्बा अब मेरे काम आ रहा था...इस जॉब के कुछ दिन पहले मैंने गायन क्लास का पता किया था मगर जॉब और क्लास दोनों का समय एक था इसलिए जीविका के लिए शौक़ की बली चढ़ गयी...इवेण्ट कम्पनी के एक दीवाली इवेण्ट के दौरान हमने विले पारले के प्राइम मॉल में एक लॉटरी सिस्टम से वहाँ के दुकानदारों को गिफ़्ट देना शुरू किया मुझे बारी बारी से उनके नाम अनाउन्स करने थे...हाथ में माइक आ गया मैंने गुनगुनाना शुरू कर दिया.. लोगों की फ़रमाइशें आने लगीं के कुछ सुना दो...बस फिर क्या था बिना किसी म्यूज़िक के कुछ स्लो रोमांटिक गाने गाना शुरू कर दिया ...एक बात है मुम्बई में यहाँ के लोग कलाकार की तारीफ़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ते...मुझे भी तारीफ़ मिली ...कम्पनी में कुछ अच्छे दोस्त मिल गये जिन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया...कुछ महीने बाद मैंने वो जॉब छोड़ दी मेरे एक दोस्त ने मुझे पेज3 रिपोर्टर की जॉब दिला दी और अब मैं दिन रात फ़िल्म और सीरियल्स के अदाकारों के इंटरव्यू लेता रहता...फ़िल्मी पार्टीज़ में जाना और उन लोगों से बातें करना मेरा रूटीन बन चुका था...कुछ लोगों को मैं खटकने लग गया था उन्होंने अपना रसूख़ दिखाते हुए मुझे डॉक्युमेंट्री रिपोर्टर बनवा के हैदराबाद भेज दिया ये कह के कि तुम डिस्कवरी चैनल के लिए काम कर रहे हो धार्मिक स्थलों मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारों की हिस्ट्री निकालो और उनपर आर्टिकल्स लिखो साथ में एक तजुर्बेकार कैमरामैन था वो अपने हिसाब से शूट कर लेता...मुझे अच्छे पैसे मिल रहे थे और फिर डिस्कवरी के लिए कौन काम नहीं करना चाहेगा मैंने पूरी लगन से 6 महीने काम किया...अब चूंकि मैं हैदराबाद में पहले भी रह चुका था 2 साल इसलिए वहाँ की लोकल ज़बान अच्छे से बोल लेता था मुझे बचपन से लिखने और नयी जगहों पर घूमने का शौक़ था जो अब पूरा हो रहा था....मेरे ताल्लुका़त काफी़ अच्छे और पहुँच वाले लोगों से बन गये थे....एक फ़ोन पे कहीं भी डॉक्युमेंट्री बनाने की परमीशन मिल जाती थी...हैदराबाद के लगभग सभी धार्मिक स्थलों की डॉक्युमेंट्री बनने के बाद मेरी कम्पनी मुझे बंगाल भेजने लगे ... मैंने सोचा पैसा कमाने में मेरे ख़्वाब तो पीछे छूट गये...मैंने इस्तीफ़ा दिया और वापस मुम्बई आ गया।

मुम्बई में मेरे एक दोस्त ने जो कि फ़िल्म का कोर्स कर रहा था मुझे उसकी प्रोजेक्ट फ़िल्म में एक रोल दिया क्योंकि उसको पता था कि मैं थियेटर और मॉडलिंग कर चुका हूँ...मैंने कभी कैमरा फ़ेस नहीं किया था...शुरू में जब मुम्बई आया था तो मेरे ख़लेरे भाई ने मुझे 15 अगस्त के लिए बन रहे एक कार्यक्रम के लिए कैमरा फे़स कराया था मगर मेरी हालत ख़राब हो गयी थी...बहुत मुश्किल से कुछ लाइनें बोल पाया था.. लेकिन पिछले एक साल ने काफ़ी कुछ सिखा दिया था ...जब मैं शूटिंग पर पहुँचा तो एक कलाकार कम था जिसको ऋषि मुनि का रोल करना था इसलिए अब मुझे दो रोल करने थे...दोनों किरदार काफ़ी अलग थे ...एक बेहद ग़ुस्से वाला तो दूसरा छल और कपट से भरा हुआ...वहाँ एक कलाकार और थे जो कि मंझे हुए रंगकर्मी थे...वो मेरा अभिनय देख रहे थे मुझे पास बुलाया और पूछा इससे पहले भी अभिनय किया है मैंने बताया कि 2-3 महीने की थियेटर वर्कशॉप किया था 7 साल पहले उसी से जो कुछ सीखा वही कर रहा हूँ...फिर उन्होंने पूछा "थियेटर करोगे मेरे साथ !!" मैंने हाँ कर दिया और उनका थियेटर ज्वॉइन कर लिया...मैं अब तक उनके थियेटर के माध्यम से 30-35 नाटकों में अभिनय कर चुका हूँ...8-10 टी.वी. सीरियल्स,एक फ़ीचर फ़िल्म,एक वेब सिरीज़ और 5-6 शॉर्ट फ़िल्मों में बतौर चरित्र अभिनेता काम कर चुका हूँ...
मेरा संघर्ष अभी जारी है और एक लोकप्रिय अभिनेता बनने का सफ़र भी.