Tuesday, April 7, 2020

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बार-बार उमरा का क्या औचित्य ? / सैयद सलमान
Friday, February 21, 2020 2:16:47 AM - By सैयद सलमान

सैयद सलमान
साभार- दोपहर का सामना 21 02 2020

इन दिनों उर्दू सहित मुस्लिम मोहल्लों में बड़ी संख्या में बिकने वाले हिंदी, मराठी, अंग्रेजी, गुजरती सहित अन्य भाषाओं के अख़बारों में 'उमरा' टूर के विज्ञापन बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हैं। हर वर्ष रमज़ान जब भी नज़दीक आने को होता है, ख़ासकर २-३ महीने पहले से उमरा की बुकिंग बढ़ जाती है। ऐसी मान्यता है कि रमज़ान के महीने में आम दिनों की इबादत या नेकी की तुलना में ७० गुना अधिक पुण्य मिलता है। एक रोज़े का सवाब, एक नमाज़ का सवाब या फिर किसी भी इबादत के बदले ७० गुना सवाब मिलने की बात जानकर भला कौन सा मुसलमान होगा जो इबादत से पीछे हटना चाहेगा। ग़रीब मुसलमान तो रोज़े रख कर, नमाज पढ़ कर ही सब्र कर लेता है, लेकिन धनी मुसलमान उमरा की नीयत से मक्का-मदीना पहुंचकर और भी शिद्दत से इबादत करने का इरादा करता है ताकि रोज़े के साथ-साथ अन्य इबादत का भी उसे ७० गुना सवाब मिले। उमरा करना भी चाहिए इस से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन क्या केवल धन की नुमाइश के लिए हर वर्ष या बार-बार उमरा के लिए जाना सच में इस्लामी लिहाज़ से दुरुस्त है? क्या कभी मुस्लिम समाज के इस गंभीर सवाल पर उलेमा और मुफ़्ती हज़रात ने ग़ौर किया है? जबकि सभी जानते हैं कि मुस्लिम समाज की अन्य कई परेशानियों से निजात दिलाने में इस धन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि मुस्लिम समाज का बुद्धिजीवी और जागरूक तबक़ा शादी-ब्याह में बेजा ख़र्च के ख़िलाफ़ अक्सर मुहिम चलाता रहा है। इसके साथ-साथ बार-बार उमरा करने वालों को समझाने की भी कोशिश हो रही है। यही बुद्धिजीवी तबक़ा चाहता है कि बार-बार उमरा जाने पर ख़र्च होने वाली रक़म को क़ौम की तालीम और भलाई के दीगर कामों में लगाना चाहिए, जिसकी इस बदहाल समुदाय को सख़्त ज़रूरत है। लेकिन मुस्लिम समाज के अधिकांश उलेमा हज़रात इस मुहिम की धार को कुंद करने में सफल होते रहे हैं। इस विषय पर अधिकांश उलेमा आम मुसलमानों को यह समझा देते हैं कि ज़कात अदा करने के बाद उन्हें अपना माल अपनी मर्ज़ी से ख़र्च करने की इजाज़त है। नियमित रूप से उमरा करने वाले उलेमा की इस बात को मान लेते हैं और इस विचार का सहारा लेते हैं कि ज़कात अदा हो गई है, इसलिए अब अपने धन का अपनी मर्ज़ी से इस्तेमाल करने के लिए हम स्वतंत्र हैं। जबकि सही इस्लामी नुक़्तए-नज़र से यह पूरी तरह नकारात्मक सोच है। ज़कात फ़र्ज़ है और इस्लाम के पांच आधार स्तंभों में से एक है। ज़कात एक निश्चित राशि से ज़्यादा कमाने वाले मालदार मुसलमानों के लिए सालाना अनिवार्य टैक्स के सामान है। समूची बचत पर सालाना २.५ प्रतिशत ज़कात हर मुसलमान को अदा करनी ही है। यह बचत चाहे नक़द राशि के रूप में हो, चाहे बैंक बैलेंस, बॉन्ड्स या धन के अन्य रूप जैसे सोना, चांदी या हीरा के रूप में। ज़कात, हज और उमरा एक दूसरे से भिन्न इबादत हैं, जिनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है।

एक साधारण अनुमान के मुताबिक लगभग ढाई लाख मुसलमान हर साल उमरा अदा करने के लिए मक्का-मदीना का सफ़र करते हैं। इस पर कम से कम एक से दो लाख रुपए प्रति व्यक्ति ख़र्च आता है। इस तरह साल भर में मुसलमान सिर्फ़ उमरा करने के लिए अंदाज़न चार हज़ार करोड़ रुपए के आसपास की भारी-भरकम रकम ख़र्च कर देते हैं। इस तथ्य को दूसरे तरीके से देखें तो हम पाते हैं कि मुसलमान एक ऐच्छिक इबादत के लिए कई सौ करोड़ रुपए उससे ज़्यादा ख़र्च कर रहे हैं, जितनी रक़म भारत सरकार अपने सारे अल्पसंख्यकों के लिए बजट में रखती है। इसमें बार-बार किए जाने वाले हज का ख़र्च नहीं जोड़ा गया है, वरना यह रक़म और बढ़ जाएगी। इस भारी-भरकम ख़र्च को देखते हुए अगर इसका पचास प्रतिशत भी मुस्लिम क़ौम की तामीर और तरक़्क़ी के लिए ख़र्च कर दिया जाए तो इंक़लाबी तब्दीली देखने को मिल सकती है। अगर पूरी ईमानदारी से इस बात की समीक्षा की जाए तो ज्ञात होगा कि मुसलमानों के ज़रिये ख़र्च की जाने वाली इस रक़म का सबसे ज़्यादा फ़ायदा टूर ऑपरेटर्स, हवाई कंपनियों और तेल की दौलत से मालामाल सऊदी अर्थ व्यवस्था को पहुंच रहा है। ऐसे में जबकि सच्चर कमेटी रिपोर्ट भी भारतीय मुसलमानों की सामाजिक व आर्थिक दुर्दशा को जग-ज़ाहिर कर चुकी है, इतनी भारी रक़म का इस तरह ख़र्च किया जाना समझ से परे है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत राष्ट्रीय उद्यम आयोग (एनसीईयूएस) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में मुसलमानों की ८४ फ़ीसद आबादी की दैनिक आय ५० रुपए से भी कम है। यानि लगभग १५ करोड़ मुसलमान रोज़ाना ५० रुपए भी नहीं कमा पाते। इसे देखते हुए धनवान क्या समर्थ मुसलमानों का क्या यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे इस दयनीय स्थिति को सुधारने के उपाय करें? यह जान लेना ज़रूरी है कि अल्लाह को किसी की नफ़िल यानि ऐच्छिक इबादतों की कोई ऐसी ख़ास ज़रूरत नहीं है, वह भी तब, जब लगभग १५ करोड़ लोग ग़रीबी के दलदल में धंसे हुए हों। इस्लाम में ‘हुक़ूक़-अल्लाह’ यानि अल्लाह के अधिकारों पर ‘हुक़ूक़ुल-इबाद’ यानि बंदे के अधिकारों को भी प्रमुखता दी गई है। साथ ही फ़िज़ूलख़र्च को भी सख़्ती से मना किया गया है। काश मुसलमान इस बात को समझ पाते।


उमरा असल में हज का ही एक रूप यानि एक ‘लघु तीर्थ यात्रा’ है। हज की तरह ही यह इबादत भी मक्का में ही अदा की जा सकती है। हज की इबादत मालदार मुसलमानों के लिए कुछ शर्तों के साथ ज़िंदगी में एक बार फ़र्ज़ यानि अनिवार्य है। उमरा और हज की प्रक्रियाओं में कई समानताएं हैं। जैसे उमरा करने की विशेष नीयत यानि दिल से इरादा करना, हज के दौरान पहने जाने वाले विशेष लिबास 'अहराम' को धारण करना, मक्का स्थित पवित्र ‘काबा’ की सात बार परिक्रमा करना, काबे की मस्जिद यानि ‘हरम शरीफ़’ में रखे काले पत्थर ‘संग-ए-असवद’ को स्पर्श करना और मौका मिले तो उसे बोसा देना अर्थात चूमना, ‘मुक़ाम-ए-इब्राहीम’ नामक स्थान पर दुआएं करना, ज़मज़म का पाक पानी पीना और अपने ऊपर छिड़कना, ‘सफ़ा’ व ‘मर्वा’ नामक छोटी पहाड़ियों के बीच सात बार हल्की दौड़ लगाना जिसे ‘सई’ कहते हैं, मर्द तीर्थ यात्री का मुंडन कराना जैसे अहकामात उमरा की पूर्ण इबादत में शामिल हैं। इस इबादत से रूहानी सुकून मिलता है इस से भी किसी को इनकार नहीं है। लेकिन क्या वक़्त नहीं आ गया कि मालदार मुसलमान इस बात ग़ौर करना शुरू करे कि बार-बार उमरा जाने पर जितना ख़र्च होता है, क्या वह रक़म मुस्लिम समाज के किसी जनहित से जुड़े काम में नहीं ख़र्च की जा सकती? ध्यान रहे, उमरा की यात्रा इस्लाम की अनिवार्य यानि फ़र्ज़ इबादतों में शामिल नहीं है। यह एक स्वैच्छिक इबादत है और इसे हर साल किया जाना भी ज़रूरी नहीं है। इसके बजाय क्या एक या दो बार उमरा करने के बाद बार-बार उमरा न करते हुए अपनी बचत राशि मुस्लिम समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में नहीं लगाई जा सकती, जिसकी मुसलमानों को सख़्त ज़रूरत है? इस्लाम में यह भी प्रावधान है कि आप 'हज-ए-बदल' कर सकते हैं यानि अपनी हलाल कमाई के पैसों से किसी दूसरे को हज करवा सकते हैं जिसका सवाब भी दोनों को सामान रूप से मिलेगा। और यही प्रावधान तो उमरा के लिए भी है। इस तरह कई ग़रीब मुसलमान हज और उमरा की सआदत हासिल कर सकते हैं। लेकिन बात जब इबादत और मुसलमान के बीच की हो तो जायज़ सवाल उठाना भी किसी जोखिम से कम नहीं है। लेकिन इस्लाम के दायरे में रहकर अब मुसलमानों की भलाई के लिए और उनकी बदहाली का रोना ख़त्म करने के लिए क्रांतिकारी फ़ैसले लेना बेहद ज़रूरी हो गया है।