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लोकतंत्र के महापर्व को जोश से मनाएं / सैयद सलमान
Friday, March 15, 2019 8:51:53 AM - By सैयद सलमान

सैयद सलमान
साभार- दोपहर का सामना 15 03 2019

आख़िर इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुईं और लोकसभा चुनाव की तारीख़ों का ऐलान हो गया। सात चरण में होने वाले इस लोकतंत्र के महापर्व के बीच में ही मुसलमानों के धार्मिक आस्था का कठिन, लेकिन त्याग और तपस्या से लबरेज़ पवित्र महीना रमज़ान भी शुरू होगा। रमज़ान महीने में होने वाले अंतिम ३ चरण के चुनाव को लेकर सियासत काफ़ी गर्म है। सियासी कारिंदों और कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस मुद्दे पर एक तरह से हंगामा मचा रखा है। मुस्लिम संगठनों ने चुनावी तारीख़ों के दरम्यान रमज़ान का हवाला दिया है और ऐतराज़ जताते हुए चुनाव आयोग से तारीख़ों में बदलाव की मांग की है। सोशल मीडिया पर बखेड़ा करने में माहिर कुछ यूज़र्स के बीच चुनाव की तारीख़ और रमज़ान एक साथ होने पर सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया के ऐसे सूरमाओं ने रमज़ान के दौरान चुनाव कराने को लेकर सरकार की नीयत पर सवाल उठाया है और एक सुर में आरोप लगाया है कि बीजेपी नहीं चाहती कि अल्पसंख्यक वोट करें। ऐसे कट्टरपंथियों की अगर मानें तो बिहार, यूपी और बंगाल में अल्पसंख्यक ज़्यादा हैं, जिनके लिए रोज़ा रखकर मतदान के लिए जाना बहुत बड़ी परेशानी की बात होगी। ऐसी शक्तियों का आरोप है कि चुनाव आयोग ने इन बातों का ख़्याल नहीं रखा।



दरअसल पांच मई से रमज़ान शुरू हो जाएगा और आख़िरी तीन चरणों यानि ६, १२ और १९ मई को मतदान के दौरान रमज़ान का महीना चल रहा होगा। कुछ मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं ने चुनाव आयोग को घेरा है कि पवित्र रमज़ान माह में मई की कड़ी धूप में मुस्लिम समाज से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह मतदान के लिए घर से निकलेगा? दिन भर बग़ैर कुछ खाए-पिये वह मतदान के लिए लंबी लाइन में किस तरह लगेगा? चुनाव की तारीख़ें रमज़ान के महीने में पड़ने पर कई राजनीतिक दलों का मानना है कि इससे मुसलमानों के वोटिंग प्रतिशत में कमी आएगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने तो इसे भाजपा का गेम प्लान बता दिया है। आप सांसद संजय सिंह ने भी इसे साज़िश बताया है। कोलकाता के मेयर फ़िरहाद हाकिम भी चुनाव आयोग पर ऊँगली उठा चुके हैं। आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान ने भी इस फ़ैसले का विरोध किया है। दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुख़ारी, फ़तेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम डॉक्टर मुफ़्ती मुकर्रम अहमद, इस्लामी विद्वान मौलाना डॉक्टर कल्बे रुशैद रिज़वी, लखनऊ ईदगाह के इमाम व शहर काज़ी मौलाना ख़ालिद रशीद फ़िरंगी महली, ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर, शिया धर्मगुरु क़ल्बे जव्वाद जैसे नामी-गिरामी मुस्लिम चेहरों ने भी ब'आवाज़-ए-बुलंद चुनाव आयोग की तारीख़ों की मुख़ालिफ़त में कड़े बयान जारी किये हैं।



वहीं दूसरी तरफ आश्चर्यजनक रूप से कट्टरवादी छवि वाले एमआईएम चीफ़ असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस नेता मीम अफ़ज़ल, मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना अतहर देहलवी और चंद अन्य मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे को बहुत ही ग़ैर-ज़रूरी बताया है। इन सभी के मतानुसार चुनाव आयोग के इस निर्णय से ज्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। राजनीति की बारीकियों को समझने वाले ऐसे नेताओं और व्यावहारिक अमल पर विश्वास रखने वाले धर्मगुरुओं का मानना है कि वोटिंग के लिए रमज़ान को मुद्दा बनाना ठीक नहीं। वैसे रमज़ान के दौरान लोकसभा चुनावों की वोटिंग पर मचे घमासान के बीच चुनाव आयोग का बयान आया है कि शुक्रवार यानि जुमा और त्योहारों के दौरान वोटिंग नहीं है। आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए यह भी कहा है कि रमज़ान के पूरे महीने चुनाव न कराना असंभव है।



एक बात मुस्लिम समाज क्यों नहीं समझ रहा कि संवैधानिक नज़रिए से २ जून से पहले नई सरकार का गठन होना ज़रूरी है। ऐसे में इसे कैसे टाला जा सकता है? साथ ही एक महीने तक चुनाव न हों, ऐसा भी कैसे संभव हो सकता है? दूसरी बात रमज़ान हर वर्ष आता है वह भी अंग्रेजी महीने के हिसाब से प्रतिवर्ष १० दिन पहले। हिंदू और मुस्लिम कैलेंडर चांद की तारीख़ों के ऐतबार से चलते हैं, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से हर वर्ष इन महीनों में १० दिन कम हो जाते हैं। तीन वर्ष बाद हिंदू कैलेंडर में 'अधिक मास' जोड़कर लगभग अंग्रेज़ी महीनों के आसपास तारीख़ें मेल खा जाती हैं लेकिन इस्लामी कैलेंडर में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। और सबसे बड़ी बात, सिर्फ़ मुसलमानों के लिए चुनाव को एक महीने पहले या बाद में कराने का आख़िर क्या तुक बनता है? क्या इस तरह की मांग विशुद्ध सांप्रदायिकता का प्रदर्शन नहीं है? इस तरह से तो चुनाव होंगे ही नहीं, क्योंकि अनेक ख़ूबसूरत विविधताओं से भरी भारतभूमि में हर माह किसी न किसी मज़हब का कोई न कोई पर्व तो आता ही है।



एक बात जो समझ में नहीं आ रही है कि ये ग़ैर-ज़रूरी विवाद हो क्यों रहा है? क्या मुसलमान रोज़ा रखकर काम पर नहीं जाते? मेहनत-मज़दूरी नहीं करते? रमज़ान में मुसलमान रोज़ा रखते हैं, काम भी करते हैं और पांचों वक़्त की नमाज़ के अलावा रात में अतिरिक्त तरावीह की नमाज़ भी पढ़ते हैं। क्या मुसलमान इतना कमज़ोर है कि अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए रोज़ा रखकर कुछ देर के लिए लाइन में खड़ा नहीं रह सकता? इतिहास गवाह है कि आज़ादी की लड़ाई में अनेकों बार रमज़ान आए लेकिन क्रांतिकारी मुसलमानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। यहां तक कि लाल किले पर १५ अगस्त को जब तिरंगा फहराया गया तब पवित्र रमज़ान का आख़िरी शुक्रवार यानि अलविदाई जुमा था। तो फिर अब अगर वोटिंग रमज़ान में है तो दिक्कत क्‍या है? ख़ास वोटिंग को रमज़ान महीने से क्यों जोड़ा जा रहा है? अगर इस मुद्दे पर कुछ नेताओं और उलेमा को आपत्ति है भी तो इस पर इतना शोर क्यों? क्यों नहीं उन्हें नजरअंदाज़ कर दिया जाता?



मुस्लिम समाज को अगर हार-जीत का डर सता रहा है तो वह थोड़ा सा पीछे जाकर देखें तो पाएंगे कि पिछले साल कैराना में लोकसभा का उपचुनाव तो रमज़ान के महीने में हुआ था। और वहां बीजेपी की ज़बरदस्त शिकस्त हुई थी। कैराना में चुनाव से कुछ माह पहले भीषण सांप्रदायिक दंगा हो चुका था। ध्रुवीकरण के तमाम मुद्दे गर्म थे। लेकिन मतदान के दिन स्थानीय हिंदू भाइयों ने मतदान के समय रमज़ान का सम्मान रखते हुए दोपहर तक मुसलमानों को पहले वोट देने की राह हमवार की। सूर्योदय से पहले पढ़ी जाने वाली फ़ज्र की नमाज के बाद ही मुस्लिम समाज ने मतदान केंद्रों का रुख़ किया और दोपहर धूप चढ़ने तक अधिकांश मुसलमानों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर लिया। हिंदू भाइयों ने ऐसा करने में उनकी मदद की और दोपहर तक ख़ुद मतदान केंद्रों से दूर रहे। बहुत ज़रुरी होने पर ही उन्होंने दोपहर तक वोट डाला। यह हमारे लोकतंत्र में एक दूसरे की भावनाओं के सम्मान की ख़ूबसूरत मिसाल है। क्या मुस्लिम समाज अपने हमवतन भाइयों को विश्वास में लेकर ऐसे माहौल को दोबारा नहीं बना सकता? अगर नेक-नीयती से प्रयास हों तो ऐसा मुमकिन है।



हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और उसकी ख़ूबी यह है कि इसमें सभी धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। एक तरफ़ अगर रोज़ा रखना ज़रूरी है तो दूसरी तरफ देश का चुनावी पर्व भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों ही अहम हैं और दोनों को ज़िम्मेदारी और खुशअख़लाक़ी से निभाना मिल्ली फ़रीज़ा है। दोनों में किसी क़िस्म का कोई टकराव भी नहीं है। न इस्लाम के नज़रिए से रोज़ा रखकर मतदान करना मकरूह या हराम है, न संविधान मुसलमानों को रोज़ा रखकर मतदान करने से रोकता है। अब जब चुनाव का ऐलान हो गया है तो मुसलमानों को किसी तरह के विवाद में न पड़ते हुए मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। खांटी सियासी रहनुमाओं और सियासी उलेमा से परहेज़ करते हुए संकीर्ण विचारों से ऊपर उठना ही मुसलमानों के लिए हितकर है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि चंद सियासी हज़रात के बहकावे में आकर वोट डालने के लिए लोग कम जाएं। यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक होगा। बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा तादाद में वोट का इस्तेमाल करना मुस्लिम समाज की बड़ी ज़िम्मेदारी है। हिंदू भाई भी व्रत करते हैं, वो भी तो मतदान करते हैं। और ख़ास बात यह कि यह पहला मौक़ा तो है नहीं कि जब रमज़ान में मतदान हो रहा हो। इस मुद्दे पर सवाल उठाना या राजनैतिक रोटी सेंकना, सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है, मुसलमानों को चाहिए कि उसे दुगुने जोश से मनाएं।